- प्रो. नंदलाल मिश्र
भारतीय जनमानस तेजी से बदल रहा है। हम गौर करें तो पाएंगे कि 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध तक इसके परिवर्तन की गति धीमी थी। लोगों के पास टीवी, रेडियो, अखबार और स्थायी फोन हुआ करते थे। इतना फ़ास्ट एक्सपोज़र भी नहीं था।मुझे याद है कि मेरे गाँव मे सन 1995 तक स्थायी फोन भी नहीं था। दूर दराज के छोटे मोटे शहरों में पीसीओ के एक दो सेंटर हुआ करते थे। जरूरत के वक्त उन्ही का सहारा लेना पड़ता था। कभी कभी मन खिन्न हो जाता था। उतना दूर जाओ और बात भी न हो तो बहुत अजीब सा लगता था। थक हार कर हम लोग अपने गांव में लैंडलाइन लगवाने की योजना बनाये, लेकिन समस्या जटिल थी।सात किलोमीटर के दायरे में कही कोई खंभा नहीं था जहाँ से लाइन खीची जाती। घर घर जाकर चंदा इकट्ठा किये और योजना बनने लगी कि लाइन किधर से लाई जाय। उसी दिनशाम को दूरदर्शन पर एक समाचार सुनने को मिला कि अब देश के कोने कोने में फोन की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी और लोग चलते चलते जिससे चाहेंगे बात कर लेंगे। सभी तैयारी सरकार के द्वारा की जा चुकी है और यह शुरू होने वाला है।इसमें किसी तरह के कनेक्शन की भी आवश्यकता नहीं होगी।
यह वक्तव्य तत्कालीन संचार मंत्री स्वर्गीय रामविलास पासवान का था। हम लोग खुश भी हुए और आलोचना भी व्यक्त किये कि यह सरकारी घोषणा है जिसका कोई भरोसा नहीं है। आखिरकार यह तय किया गया कि कुछ दिन देख लिया जाय फिर कोशिश करेंगे। जिस पर सहज विश्वास नहीं किया जा सकता था वह कार्य मूर्त रूप लेने लगा। मैंने भी एक अदद सिम की तलाश शुरू की।मुझे बीएसएनएल का एक सिम मिला, लेकिन उसकी कीमत काफी अधिक थी क्योंकि मुझे वह सिम ब्लैक में खरीदनी पड़ी। देखते देखते पूरे भारतवर्ष में लोग हाथों में मोबाइल लेकर चलने लगे। यह बात सन 2000 के आसपास की है।आज लगभग21 वर्षो में इस क्षेत्र में बाढ़ सी आ गयी। एक-एक आदमी के पास कई कई मोबाइल और अम्बानी की कृपा से नेट की व्यवस्था ने एक नई दुनिया पैदा कर दी जिसने न सिर्फ लोगो को आपस मे जोड़ने का कार्य किया अपितु इसने लोगो की जीवन शैली बदल दी।
इस सूचना तंत्र ने न सिर्फ भारत में लोगों को बदला अपितु समूचे विश्व मे इसने अजीबोगरीब परिवर्तन कर डाले। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां इसकी पहुँच न हो। इसने आदमी के बहुत सारे कार्यो को आसान कर दिया। वहीं इसने विश्व मे करोड़ो रोजगार पैदा किये। मोबाइल बनाने वाली कंपनियां विश्व के आर्थिक जगत में छा गयी। मोबाइल से जुड़े एसेसरीज के क्षेत्र में करोड़ों रोजगार सृजित हुए। यूज़ एंड थ्रो के जमाने मे हर साल मोबाइल बदलने की होड़ और उसके साजो सज्जा से जुड़े उपकरणों को खरीदने की होड़ सी बनी रहती है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि दुनिया दो हिस्से में बंट गयी है। एक मोबाइल कंप्यूटर नेट चलाने और जानने वाली दुनिया और दूसरी इसके ज्ञान के अभाव में दूसरोँ पर आश्रित रहने वाली दुनिया।
अब जबकि दुनिया डिजिटलीकरण के दौर से गुजर रही है और सभी कार्य ऑनलाइन सम्पन्न होने लगे हैं ऐसे वक्त में अब सामान्य जीवनचर्या के लिए भी हमें और आप सभी को मोबाइल कंप्यूटर और नेट का ज्ञान लेना अवश्यम्भावी और अपरिहार्य हो गया है। जिंदा रहने के लिए और समाज में बने रहने के लिए इसको सीखना अनिवार्य है, अन्यथा आप समाज में चलने में भी असमर्थ हो जाएंगे। इसलिए जो लोग अभी तक इसे वैकल्पिक मान कर जीने की कल्पना कर रहे थे वे जीयेंगे तो जरूर पर पशुवत। अब यह लोकाचार का अनिवार्य और अभिन्न अंग बन चुका है। आप ए बी सी डी और क ख ग घ पढ़े या न पढ़ें पर मोबाइल और नेट जरूर पढ़ें।
अब आईये और देखिए इस व्यवस्था ने मात्र 21 वर्षों की अल्प अवधि में ही किस किस तरह के कार्यो को अंजाम दिए हैं और हमारे समाज को कहां से कहाँ पहुँचा दिए हैं। भारतीय समाज इसके प्रभाव से अस्त-व्यस्त हो चुका है।सामाजिक अनुशासन क्षीण होता जा रहा है, यहां तक कि लोग यह कहने लगे हैं कि यह परिवर्तन पीढ़ी गैप के कारण है। यह पीढ़ी गैप का संप्रत्यय कहाँ से आ गया। दादा का लड़का पिता और पिता का लड़का तुम। जब तीनो पीढ़ियां हैं तो गैप कहाँ हुआ। हां यह गैप इसी सूचना तंत्र ने कृत्रिम रूप से पैदा किया है और इस गैप ने आपसी संबंधों, आपसी व्यवहारों और सामाजिक पारिवारिक मान मर्यादाओं को बुरी तरह हिला दिया है।
मान्यताएं टूट रही हैं, परंपराएं करवट ले रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है जबकि इस सूचना प्रौद्योगिकी ने बैंकों के कार्य आसान बना दिये। लोगों को अब हर कार्य के लिए बैंक जाने की जरूरत नहीं रही। बैंक आपके मोबाइल में आ गया है। बाजार और व्यवसाय में नकद लेन देन का काम नही रहा।आप घर बैठे सभी कार्य कर सकते हैं। इसने जीवन को आसान बना दिया। मोबाइल पर सभी कुछ हर समय मौजूद है। आपको चुनना है कि आप को चाहिए क्या।
महात्मा गांधी चित्रकूट विश्वविद्यालय
चित्रकूट (सतना)।




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