BRICS में मोदी की कूटनीतिक ‘बाजीगरी’ से पाकिस्तान में खलबली, दिल्ली में बन रहे नए समीकरणों पर इस्लामाबाद की नजर
चीन से रिश्तों में सुधार से लेकर रूस, ईरान और सऊदी अरब की मौजूदगी तक—भारत की बढ़ती कूटनीतिक पकड़ ने बढ़ाई पाकिस्तान की चिंता
राजधानी दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के बीच भारत की सक्रिय कूटनीति ने पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ा दी है। सम्मेलन में चीन, रूस, ईरान और सऊदी अरब जैसे महत्वपूर्ण देशों की मौजूदगी के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों के साथ मुलाकातों और बातचीत पर इस्लामाबाद की नजर बनी हुई है। पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चिंता भारत और चीन के रिश्तों में संभावित सुधार को लेकर बताई जा रही है।
मोदी-शी मुलाकात पर पाकिस्तान की नजर
पाकिस्तान की रणनीतिक चिंता का सबसे बड़ा कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच प्रस्तावित मुलाकात है। सीमा विवाद के बाद भारत और चीन के बीच धीरे-धीरे संवाद बहाल हुआ है। दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन, व्यापार और निवेश समेत कई मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ रही है।
इस्लामाबाद के लिए चुनौती इसलिए बढ़ रही है क्योंकि पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति लंबे समय से भारत के खिलाफ चीन के समर्थन को महत्वपूर्ण मानती रही है। यदि भारत और चीन टकराव से आगे बढ़कर प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व की दिशा में जाते हैं, तो पाकिस्तान के लिए अपनी पारंपरिक रणनीतिक गणना बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
मोदी-पुतिन समीकरण भी चिंता का कारण
पाकिस्तान की दूसरी चिंता भारत-रूस रक्षा सहयोग को लेकर है। प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच बातचीत में रक्षा सहयोग, एस-400 और भविष्य की तकनीकी साझेदारी जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा संबंधों को देखते हुए पाकिस्तान की नजर इस बात पर है कि दिल्ली और मॉस्को के बीच आगे किस तरह के नए रक्षा समझौते और तकनीकी सहयोग सामने आते हैं। खासतौर पर भारत की वायु रक्षा और लंबी दूरी की मारक क्षमता को मजबूत करने वाले समझौते पाकिस्तान की सैन्य रणनीति के लिए चुनौती बन सकते हैं।
सऊदी अरब और ईरान भी बढ़ा रहे बेचैनी
BRICS सम्मेलन में सऊदी अरब और ईरान की मौजूदगी भी पाकिस्तान के लिए अहम मानी जा रही है। भारत के दोनों देशों के साथ रिश्ते लगातार मजबूत हुए हैं। ऐसे में इस्लामाबाद की चिंता यह है कि पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक पहुंच और प्रभाव और बढ़ सकता है।
ईरान के साथ भारत के पुराने रणनीतिक संबंधों में चाबहार बंदरगाह समेत कई महत्वपूर्ण पहल शामिल हैं। वहीं सऊदी अरब के साथ ऊर्जा, निवेश और रणनीतिक सहयोग के रिश्ते लगातार गहरे हुए हैं। पाकिस्तान के लिए चुनौती यह है कि जिन देशों के साथ वह अपने रणनीतिक संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है, उन्हीं के साथ भारत भी समानांतर रूप से मजबूत रिश्ते विकसित कर रहा है।
जिस BRICS की सदस्यता चाहता है पाकिस्तान, उसकी मेजबानी भारत कर रहा
पाकिस्तान की बेचैनी का एक और कारण BRICS की सदस्यता की उसकी महत्वाकांक्षा है। पाकिस्तान लंबे समय से इस समूह में शामिल होने की इच्छा जताता रहा है। लेकिन समूह के विस्तार के लिए सदस्य देशों की सहमति महत्वपूर्ण है और ऐसे में भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है।
दिल्ली में हो रहा BRICS सम्मेलन पाकिस्तान के लिए इसलिए भी असहज स्थिति पैदा कर रहा है क्योंकि एक ओर भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान इस मंच में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
बदलते शक्ति संतुलन पर इस्लामाबाद की नजर
कुल मिलाकर दिल्ली का BRICS सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक और दक्षिण एशियाई शक्ति संतुलन का भी संकेत दे रहा है। चीन, रूस, ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ भारत की समानांतर कूटनीतिक सक्रियता पाकिस्तान के लिए रणनीतिक चुनौती के रूप में देखी जा रही है।
इसी वजह से इस्लामाबाद की नजर दिल्ली में होने वाली हर महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक और उससे निकलने वाले संकेतों पर टिकी है। भारत की बढ़ती वैश्विक सक्रियता और प्रमुख शक्तियों के साथ उसके रिश्तों में बन रहे नए समीकरण पाकिस्तान की विदेश और सुरक्षा नीति के लिए आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन सकते हैं।




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