सकल बन लग रही आग...!
- ललिता जोशी
जब खुसरो साहब ने आज से 700 वर्ष पहले बसंत ऋतु के त्योहार पर अपने गुरु निज़ामुद्दीन औलिया को खुश करने के लिए “सकल बन फूल रही सरसों”
लिखी थी । कितनी मधुर और सुरीली है ये रचना । आज भी बसंत ऋतु के दौरान ये रचना गाई जाती है । क्या हिन्दु क्या मुस्लिम सभी को आज तक ये पसंद है और गायक जब इसे गाते हैं तो श्रोता झूम उठते हैं ।ठीक इसके विपरीत जैसे ही गर्मी आती है तो सूर्य देवता आकाश से आग बरसाते हैं और धरती भी गरम तवे की तरह तप्ति है । पृथ्वी की वनस्पति और जीव -जन्तु गर्मी से हाहाकार कर उठते हैं । गर्मी से बचने के लिए अब तो एक से एक उपकरण हैं आदमी के पास । आज तो 50 डिग्री के तापमान में बर्फीली ठंड का अहसास ले सकते हैं । आज एसी और वातानाकुलन के कारण सर्दी में गर्मी का एहसास और गर्मी में ठंडी का मजा लिया जा सकता है । विकास के कारण आज आम आदमी भी इस सब के मजे ले रहा है ।
घर हो या कार्यालय, दुकान, मकान और कोचिंग सेंटर हो या फिर होटल सभी में वातानुकूलन या फिर एसी लगाए ही जाते हैं । कूलर को अगर ठीक तरह से साफ न कराया जाये तो डेंगू के मच्छर उत्पन्न हो जाते हैं । इसीलिए अब एसी के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ा है । एसी का रखरखाव भी थोड़ा आसान होता है । इसीलिए एसी का चलन बदता ही जा रहा है । इतना ही नहीं अब हाइटेक इलेक्ट्रोनिक गूड्स हर घर की आवश्यकता बन गए हैं और इनकी उपस्तिथि रसोई घर से लेकर बाथरूम और मेनडोर की एंट्री तक होता है । इनसे चाहे वो घर हो या दुकान हो या फिर सिनेमा हाल हों या फिर सेंटर्स हो सब बड़े ही चुस्त और दुरुस्त लगते हैं । वैसे टेक्नोलोजी के लाभ बहुत हैं लेकिन इसका इस्तेमाल भी समझदारी से न किया जाये तो लेने के देने पड़ जाते हैं । आजकल हम सब देख ही रहें हैं की कहीं न कहीं आग लग रही हैं और ये सब हो रहा मॉडर्न फिटटिंग्स चाहे वो बिजली की हो या बिजली के उपकरण हो इन सभी के कारण बिजली की मांग दिनों -दिन बढ़ती ही जा रही है । अब तो अपने देश में जे जे कॉलोनियों में भी एसी लगे हुए हैं । अच्छा लगता है देखकर कि सभी को इसकी ठंडी हवा खाने को मिल रही है ।
एक तरफ चमचमाती इमारतें और उनमें चलती व्यावसायिक गतिविधियों से आने वाली आमदनी से मालामाल होते इनके मालिक मानो दोनों हाथों में लड्डू और सिर कढ़ाही में हो । कमर्शियल गतिविधियां चलाने के लिए इन इमारतों के मालिकों को सिस्टम में न जाने किन -किन को रिश्वत देते हैं ताकि सिस्टम आँख मूँद ले और मालिक बेधड़क होकर अपने धंधे चलाते रहते हैं । होटल में रहने वाले लोग और इलाज के लिए बाहर से आए लोग इनमें रहते हैं । आम आदमी तो प्रशासन के भरोसे ही अपना जीवन जीता है और प्रशासन के धोखे से अपना जीवन हार भी जाता है । प्रशासन के लापरवाहीपूर्ण रवैये के कारण जगह -जगह आग लगी और इस आग ने न जाने कितनों के जीवन को लील लिया। इस आग ने न जाने कितने घरों के चिराग बुझा दिये । सारे देश में आग ने कहर मचा रखा है । कई बार तो लगता है कि मौसम आया आग का या फिर लगता है सकल बन लग रही आग ।
जब आग लगने की दुर्घटना होती है तो सब चाक -चौबंद हो जाते हैं । अफरा-तफरी में सिविक ऐजेंसियों के बड़े पदाधिकारी या संबद्ध मंत्री कुछ अधिकारियों का तबादला कर अपने कर्तव्य से इतिश्री कर लेते हैं । बिल्डिंगों के मालिकों और वहाँ के स्टाफ को गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डाल दिया जाता है । अरे भाई बिल्डिंग में काम करने वाले स्टाफ को गिरफ्तार करने से क्या समस्या का हल होने वाला है ? समस्या का मूल प्रत्येक स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और कम समय अधिक आमदनी की चाहत है । इसके साथ कानून को अपने घर की वो चादर समझना जिसे जैसे चाहो ओढ़ लो की दृढ़ भावना है । कानून का दर तो जैसे किसी को है नहीं । इसीलिए अपराधी बेखौफ होकर अपना काम करके निकल जाते हैं ।
पूरे देश में आग से होने वाली दुर्घटनाओं में आए दिन वृद्धि होती जा रही है । इन दुर्घटनाओं में मरने वाले अधिकतर नौजवान युवक और युवतियाँ ही होते हैं । जो अपने सपनों को मूर्त रूप देने के लिए कोचिंग संस्थानों में प्रवेश लेकर जी तोड़ मेहनत करते हैं । ये जी तोड़ मेहनत तो आग लगने पर अपना जीवन बचाने पर लग जाती है । जो अभागे होते हैं वो तो जीवन से हाथ धो बैठते हैं और जो बच जाए उसे इस ट्रामा से निकले में काफी समय लग जाता है । आग के इस तांडव से देश का प्रत्येक राज्य ग्रसित है । ये भी सर्वव्यापी है यत्र -तत्र सर्वत्र । इस आग को तांडव का अधिकार दिया हमारे भ्रष्ट तंत्र और मालिकों के लालच ने नवजात शिशुओं से लेकर युवा बच्चों और बुजुर्गों की जान ही ले ली । यक्ष प्रश्न ये है कि इस सबका का जिम्मेदार कौन है ?
क्या इसके लिए प्रशासन और सिविक एजेंसी ही हैं ? इस सब के लिए हम सभी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं । जब आम आदमी शॉर्टकट अपनाकर अपना काम करवाना चाहता है तो वो भी इसके लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेता है तो उस पर हावी होता है भ्रष्ट प्रशासन ।
इसीलिए तो सकल बन फूल रही सरसों की जगह सकल बन लग रही आग....मानो मौसम आया आग का....।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)





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