वकालत में फर्जी डिग्री और अपराधियों पर हाईकोर्ट सख्त
इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश: 105 फर्जी डिग्रीधारी वकीलों पर एफआईआर दर्ज हो, गंभीर मामलों में लाइसेंस निलंबित करने पर विचार
न्याय व्यवस्था की साख बचाने के लिए बार काउंसिल और प्रशासन को दिए कड़े निर्देश
प्रयागराज, 18 जुलाई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में वकालत के पेशे में कथित अपराधी तत्वों और फर्जी डिग्रीधारी अधिवक्ताओं की बढ़ती मौजूदगी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए बार काउंसिल और राज्य प्रशासन को सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने कहा कि यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई तो न्याय व्यवस्था में आम जनता का विश्वास प्रभावित हो सकता है।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने मोहम्मद कफील की याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), डीजीपी (अभियोजन), उत्तर प्रदेश बार काउंसिल तथा रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसायटीज़ एवं चिट्स से अधिवक्ताओं के आपराधिक रिकॉर्ड, फर्जी डिग्रियों और अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट तलब की थी।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में 5.14 लाख से अधिक सक्रिय अधिवक्ता पंजीकृत हैं। इनमें 4,157 अधिवक्ताओं के खिलाफ कुल 5,056 आपराधिक मामले दर्ज हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 418 अधिवक्ताओं पर तीन या उससे अधिक मुकदमे लंबित हैं, जबकि कुछ के खिलाफ 40 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद वे वकालत कर रहे हैं। प्रमाणपत्र सत्यापन अभियान के दौरान 105 अधिवक्ताओं की कानून की डिग्रियां फर्जी पाई गईं।
हाईकोर्ट ने बार काउंसिल की अनुशासनात्मक व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। न्यायालय ने कहा कि गंभीर मामलों के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो रही है। चुनाव के दौरान अनुशासनात्मक समितियों के भंग हो जाने से लंबित मामलों के निस्तारण में देरी होती है, जिसका लाभ कथित रूप से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वकालत करने वाले लोग उठाते हैं।
अदालत ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को निर्देश दिया कि फर्जी डिग्री वाले 105 अधिवक्ताओं के विरुद्ध धोखाधड़ी, जालसाजी और प्रतिरूपण सहित संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई जाए। साथ ही जिन अधिवक्ताओं के विरुद्ध जघन्य अपराधों में आरोपपत्र दाखिल हो चुके हैं, उनके खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर उनकी वकालत का लाइसेंस निलंबित करने पर विचार किया जाए।
हाईकोर्ट ने जिला न्यायाधीशों, पुलिस अधिकारियों और बार काउंसिल के बीच नियमित सूचना आदान-प्रदान की व्यवस्था विकसित करने के भी निर्देश दिए, ताकि ऐसे मामलों में समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
अपने निर्णय में न्यायालय ने कहा कि अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि न्याय वितरण प्रणाली के महत्वपूर्ण अंग हैं। इसलिए विधि व्यवसाय की गरिमा, पारदर्शिता और शुचिता बनाए रखना बार काउंसिल तथा न्यायपालिका की साझा जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि कठोर और प्रभावी सुधारात्मक कदम उठाकर ही न्यायपालिका में जनता के विश्वास को मजबूत बनाए रखा जा सकता है।


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