खो रही संवेदनाएं
राजीव त्यागी
विकास का अर्थ केवल आर्थिक आंकड़े या चकाचौंध बढ़ाना नहीं, बल्कि मानव जीवन की सहजता, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखना है। इस बात को सभी लोगों को समझना होगा।
दिन-रात बारह से चौदह घंटे हाड़तोड़ परिश्रम करने वाले आम नागरिक को मनोरंजन के नाम पर डिजिटल मीडिया तथा देर रात तक चलने वाले खेल प्रसारणों का अभ्यस्त बनाया जा रहा है। इसका एकमात्र उद्देश्य उपभोक्तावाद को बढ़ावा देकर आम जनता की जेब से पैसा निकालना और शासन तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कमाई बढ़ाना है।
क्रिकेट, सिनेमा एवं सोशल मीडिया का यह घातक त्रिकोण मानव को एक संवेदनहीन एवं विचारशून्य मशीन में परिवर्तित कर रहा है। प्रगति तथा राष्ट्र निर्माण की आकांक्षा नि:संदेह प्रशंसनीय है, परंतु यदि इस प्रगति की नींव में मानव मूल्यों का विनाश एवं प्राकृतिक संतुलन का ह्रास छिपा हो, तो ऐसी समृद्धि अंतत: खोखली ही सिद्ध होती है। अत्यधिक काम, अनिद्रा तथा डिजिटल लत के कारण आज का समाज विचित्र मानसिक तनाव, एकांतवास और अस्वाभाविक जीवनशैली का शिकार हो रहा है।
व्यक्ति धीरे-धीरे अत्यधिक आत्मकेंद्रित एवं संवेदनहीन बनता जा रहा है, जिससे सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होने की कगार पर है। शासन तथा समाज दोनों को ही इस स्थिति की गंभीरता को तुरंत समझना होगा। विकास का अर्थ केवल आर्थिक आंकड़े या चकाचौंध बढ़ाना नहीं, बल्कि मानव जीवन की सहजता, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखना है।
यदि समय रहते इस अमानवीय कुव्यवस्था तथा अंधाधुंध व्यावसायीकरण पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया, तो जिस समृद्ध राष्ट्र का स्वप्न हम देख रहे हैं, उसमें जीवन जीने योग्य स्वस्थ एवं संवेदनशील मानव ही शेष नहीं बचेंगे।





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