जनता,जनतंत्र, जनसेवक और जन प्रतिनिधि

- प्रो. नंदलाल
आधुनिक संदर्भों में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो गया है कि लोकतंत्र या जनतंत्र में किसकी प्रासंगिकता और महत्ता अधिक है। इसका उत्तर सामान्य रूप से दिया जा सकता है। लोकतंत्र में शक्ति जनता में निहित होती है पर हकीकत में वह शक्ति मात्र चंद सेकंड के लिए ही होती है जब वह वोट डालने जाता है और मशीन का बटन दबने में जितना समय लग जाय वही उसकी शक्ति और प्रासंगिकता है। उसके बाद जनता अप्रासंगिक हो जाती है। वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पाती क्योंकि उसने अपने मताधिकार का उपयोग कर लिया है।उसने सरकारें बना दी हैं। और वास्तव में उसने अपना सरकार, हुजूर बना दिया है। जब उसने अपना हुजूर और सरकार बना दिया फिर उसे निश्चिंत हो जाना चाहिए कि आगे जो होगा सब अच्छा होगा। पर ऐसा होता नहीं है।

जनतंत्र सभी तंत्रों में अच्छा माना जाता है कि जनता अपने पसंदीदा व्यक्ति और दल को चुनेगी और एक निर्वाचित सरकार की स्थापना करेगी। अधिकतर देशों में यह शक्ति जनता में निहित न होकर डिक्टेटरों के हाथ में होती है और वे जब तक चाहते हैं सत्ता में बने रहते हैं। पर जनतंत्र की खूबियां अलग ही हैं जहाँ समाज के हर वर्ग को मताधिकार प्राप्त है। यहां एक महत्वपूर्ण बात ध्यातव्य है कि जिन देशों में वर्गवाद या जातिवाद या समाज विभेदन के तत्व मौजूद हैं वहां चुनावों में वे ही तत्व उभर कर सामने आ जाते हैं। अर्थात समाज का स्तरीकरण, श्रेष्ठता हीनता ऊँच नीच जैसी प्रवृत्तियां हावी होने लगती है और जनतंत्र जाति और स्तर के मकड़जाल में उलझ जाता है। इससे जन तंत्र अपना अर्थ खो देता है और स्तरीकरण की मनोदशा अपना प्रभाव छोड़ने लगती है।

राज्य की शक्ति का स्रोत जो जनता होती है उसी की इच्छा के अनुसार जनतंत्र चलता है। जनतंत्र में जनसत्ता, समानता, स्वतंत्रता, न्याय, बंधुत्व और उत्तरदायी शासन की प्रवृति होनी चाहिए, पर होता उल्टा है। जनता क्या चाह रही है और नेता क्या करना चाह रहे हैं, इसमें बहुत बड़ा गैप होता जाता है और जनतंत्र होते हुए भी जनता मूकदृष्टा बनकर रह जाती है। कोई भी दल हो,कोई भी विचारधारा हो जब वे सत्ता में आते हैं तो उनकी भी प्राथमिकताएं पूर्वनिर्धारित होती हैं, उसे पूरा करने में लग जाते हैं। इस तरह जनता की अपेक्षाएं गौड़ हो जाती हैं।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यदि जनता की अपेक्षाओं को समझना हो तो यह एक जटिल कार्य हो जाता है। अपेक्षा समझते समझते पांच वर्ष का कार्यकाल समाप्त हो जाता है न तो जनता की आकांक्षाएं पूरी हो पाती हैं न ही सत्ताधारी सरकार की प्राथमिकताएं पूरी हो पाती हैं। ऐसे में जनता में निराशा का भाव पनपता है और तरह तरह की मांगे सामने आने लगती हैं।

जब जनता की तरफ से इन बातों पर ध्यान दिया जाय तो जनता की असंख्य मांगे हो सकती है। इन अलग-अलग मांगों को पूरा नहीं किया जा सकता। कोई भी सरकार नहीं कर पाती। सरकारें वही काम करती हैं जिससे बहुतायत जनसंख्या को लाभ मिल सके और मिले लाभ से राष्ट्र की समृद्धि में उछाल आए। इसीलिए देश के हर कोने से जनता के प्रतिनिधि नेता चुने जाते हैं और वे नेता सरकार के समक्ष उस क्षेत्र की समस्याओं को उठाते हैं। पर कहीं कहीं ऐसा भी सुना जाता है चुनाव जीतने के बाद नेता अपने क्षेत्र में जाता ही नहीं है और न तो उसके पास अपनी जनता की आवाज सुनने का वक्त है। अच्छा शासन वही माना जाता है जब नौकरशाह और नीति निर्माता दोनों जनता के प्रति वफादार हों।

वैसे तो भारतीय जनता इतनी संतोषी है कि वह सरकारों से ज्यादा अपेक्षा ही नहीं रखती। उसका जीवन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति में ही उलझा रहता है। हां, कुछ भाग जनता का ऐसा भी है जो सरकार से बहुत अपेक्षाएं पाले रहता है। जो गरीब हैं और गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं उनकी अपेक्षाएं अधिक रहती हैं। पर सामान्य जनता चाहती है कि हमारा जन प्रतिनिधि उसके क्षेत्र का विकास करे जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विद्युतीकरण, सूचना के अविरल स्रोत, यातायात की समुचित व्यवस्था, अच्छी सड़के, अच्छे अस्पताल और अच्छे बाजार की व्यवस्था हो। बच्चे पढ़ लिखकर रोजगार प्राप्त करें।

आज गडकरी जी की दूरदृष्टि से पूरे देश में सड़कों का जाल बिछ रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेयी जी की स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना सफलीभूत हो रही है तथा जनता इस कार्य से बेहद प्रसन्न है। विकास के पहिये को तो इसी पर दौड़ना है। लेकिन बहुत से क्षेत्र ऐसे हैं जहां अभी बहुत कार्य बाकी हैं। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि जनतंत्र में जनता की बात को हर कार्यालय, हर अधिकारी और हर नौकरशाह द्वारा सहानुभूतिपूर्वक सुना जाना चाहिए। किसी भी अधिकारी और कर्मचारी को जनता के साथ आक्रामक व्यवहार नहीं करना चाहिए। सभी नौकरशाह आखिकार जनसेवक ही हैं पर जनता इनसे संतुष्ट नहीं रहती।

कोई नेता तभी नेता बन पाता है जब जनता उसे नेता मान ले। आज भारतीय लोकतंत्र में बहुत से ऐसे नेता पैदा हो गए हैं जो जनता में जाति के नाम पर गाली गलौज करते देखे जाते हैं। जातिवाद, वर्गवाद की घिनौनी राजनीति करके जनता को ठगते हैं। क्या यही जनतंत्र है।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)

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