पृथ्वी को बचाना हमारी जिम्मेदारी
इलमा अज‍़ीम 

मनुष्य तथा प्रकृति का संबंध अत्यंत घनिष्ठ है। प्रकृति हमें जीवन के लिए प्राणवायु, पानी, भोजन और आश्रय सब कुछ देती है। आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है। विश्व का वर्तमान पर्यावरणीय परिदृश्य अत्यंत भयावह है। आज पर्यावरण के मुख्य धारक तत्वों – पंचमहाभूतों का मूल स्वरूप तीव्र गति से बिगड़ रहा है। समस्त प्राणियों को धारण कर उन्हें बसाने वाली धरती नित्य बढ़ते ताप से तप्त होकर बुखार से पीड़ित है। जीवनदायक जल का जीवन संकट में है। 

विश्व के कई भूभागों में लोग पेयजल के लिए संत्रस्त हैं। जल-संकट जनसमुदाय के पलायन, विस्थापन, कलह, आधि-व्याधि, मनमुटाव और आपसी संघर्ष का कारण बनकर दुनिया को तीसरे युद्ध की ओर धकेल रहा है। सुख के साधनों में बेतहाशा वृद्धि से बिजली, प्राकृतिक गैस तथा जीवाश्म ईंधन की खपत में असीमित बढ़त हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप विश्व-वसुधा ग्लोबल वार्मिंग के ताप से झुलसने लगी है। ग्लोबल वार्मिंग अब वैश्विक चेतावनी दे रही है।
 यह इस शताब्दी की सबसे खतरनाक पर्यावरणीय समस्या बनकर उभर रही है। धरती के तापमान में हो रही वृद्धि से जमीन की शुष्कता बढ़ रही है तथा कृषि योग्य उपजाऊ जमीन लगातार घट रही है। इस असह्य गर्मी से शारीरिक, मानसिक, आर्थिक तथा सामाजिक दुष्प्रभावों की आशंकाएँ व्यक्त की जाने लगी हैं। पृथ्वी का ताप इसी गति से बढ़ता रहा तो कुछ दशकों के बाद गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, छोटे बच्चों, खुले में काम करने वाले व्यक्तियों तथा वृद्धजनों का जीवन मुश्किल में पड़ने की प्रबल आशंका है। 

पर्यावरण-संरक्षण हेतु व्यक्तिगत प्रयत्नों के साथ ही राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सार्थक प्रयास अपेक्षित हैं। अतः सम्पूर्ण विश्व को इस दिशा में गंभीर प्रयास करने ही होंगे। सौर ऊर्जा, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बढ़ाकर कार्बन-उत्सर्जन को रोकना होगा। पौधरोपण अभियान चलाने के साथ ही वृक्षों की कटाई पर भी रोक लगानी होगी। 

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