पीठ पर सड़क


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'
तेज दुपहरी में धूल उड़ाती पगडंडी पर चार जोड़ी पैर थरथरा रहे थे। बांस की उस चरचराती खटोली पर एक भारी चुप्पी पसरी थी। गोपी ने कंधे का अंगोछा बदलते हुए कहा, “अरे भाई सुकना, ज़रा संभल के। आगे पत्थरों की भरमार है। कहीं मैया का जी और न डोले।”
सुकना ने माथे का पसीना पोंछा, “हां रे भाई, छाता ज़रा ठीक से तान। सूरज आज आग उगल रहा है, मानो हमारी किस्मत को ही भून डालेगा।”
खटोली पर लेटी देह बेजान थी, आंखें मूंदे, जैसे इस दुनिया की सारी हलचल से नाता तोड़ चुकी हो। चिढ़ौती नामक गांव के इस रास्ते पर हर कंकड़ एक नुकीला सवाल था। सदियों से इस माटी ने छाती चीरकर कोयला और पत्थर बांटे, पर बदले में उसे मिली सिर्फ पैरों को लहूलुहान करती यह पगडंडी।
छोटा मंगरा आगे-आगे रास्ता दिखा रहा था। वह बड़बड़ाया, “शहर वाले कहते हैं, देश बहुत आगे निकल गया है। चमचमाती गाड़ियां हवा से बातें करती हैं।”
गोपी कड़वाहट से हंसा, “हां रे! हमारे पहाड़ों को खाकर जो आलीशान कोठियां बनी हैं, वहीं वो गाड़ियां खड़ी होती हैं। हमारे हिस्से तो बस यह डगमगाती लकड़ी आई है। सरकारी बाबू कल ही तो कह रहे थे कि कागज़ पर सड़क बन चुकी है, बस ज़मीन पर उतरना बाकी है। शायद हमारी पीठ ही उनकी सड़क है।”
तभी सुकना का पैर फिसला, खटोली डगमगाई। “राम-राम! ज़रा धीरे।” गोपी चिल्लाया। खटोली पर कोई हलचल नहीं हुई।
दूर, विकास के बड़े-बड़े होर्डिंग चमक रहे थे, जिन पर मुस्कुराते चेहरे 'मुफ़्त इलाज और खुशहाली' का ढिंढोरा पीट रहे थे। उन चमकीले विज्ञापनों के ठीक नीचे से यह चार कंधों का जनाज़ा गुज़र रहा था।
अस्पताल की ढलान आते ही गोपी ने राहत की सांस ली, “चलो, पहुंच गए। मैया! आंखें खोलो, अब डॉक्टर बाबू सुई लगा देंगे, सब दर्द मिट जाएगा।”

जैसे ही खटोली नीचे रखी गई, गोपी ने मैया का कंबल हटाया। अंदर कोई बीमार इंसान नहीं था। वहां तो गांव के स्कूल की वह टूटी हुई 'दीवार घड़ी' और कुछ 'सरकारी कागज़ात' बंधे थे, जिन पर महीनों पहले अस्पताल की मंजूरी की मुहर लगनी थी।

सुकना रो पड़ा, “मैया तो कल रात ही बिना दवा के दम तोड़ चुकी थी गोपी! हम तो इस मरे हुए सिस्टम की लाश को कंधे पर उठाकर साहब को दिखाने लाए हैं, ताकि वो अपनी चमचमाती सड़क पर इस कागज़ी भूत का इलाज कर सकें।”

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