आधी आबादी और हिंसा
इलमा अज़ीम
भारतीय समाज में महिलाओं को सशक्त बनाने के दावे लंबे समय से किए जाते रहे हैं। उन्हें ‘आधी आबादी’ और विकास की समान भागीदार कहा जाता है। शिक्षा, रोजगार, राजनीति और नेतृत्व के क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए अनेक योजनाएं बनाई जाती हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों के योगदान को राष्ट्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए उन्हें ‘नेशन बिल्डर’ अर्थात् राष्ट्रनिर्माता कहा। न्यायालय ने यह भी माना कि घरेलू कार्यों और परिवार की देखभाल में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले श्रम का आर्थिक मूल्य है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े बताते हैं कि देश में ग्रामीण क्षेत्रों की प्रत्येक चौथी तथा शहरी क्षेत्रों की प्रत्येक छठी महिला किसी न किसी रूप में हिंसा का शिकार होती है। यह स्थिति एक गहरे विरोधाभास को उजागर करती है। जिस महिला को राष्ट्रनिर्माता कहा जा रहा है, वही महिला अपने घर, परिवार और समाज में असुरक्षा और हिंसा का सामना करने को विवश है। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय समाज में महिलाओं के अवैतनिक श्रम को मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। वास्तव में महिलाओं का यह अदृश्य श्रम देश की अर्थव्यवस्था की नींव है।
यदि इस श्रम का आर्थिक मूल्यांकन किया जाए और उसे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में शामिल किया जाए, तो भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर काफी बदल सकती है। लेकिन इसी संदर्भ में दूसरा पक्ष और भी अधिक चिंता पैदा करता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा आज भी एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक चौथी महिला और शहरी क्षेत्रों में प्रत्येक छठी महिला हिंसा का सामना करती है। 18 से 49 वर्ष आयु वर्ग की विवाहित महिलाओं में लगभग 22 प्रतिशत ने स्वीकार किया है कि उन्हें वैवाहिक जीवन में घरेलू हिंसा झेलनी पड़ी। यह स्थिति एक गहरे विरोधाभास को उजागर करती है। जिस महिला को राष्ट्रनिर्माता कहा जा रहा है, वही महिला अपने घर, परिवार और समाज में असुरक्षा और हिंसा का सामना करने को विवश है।
यह स्थिति तब है जब महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक कानून बनाए जा चुके हैं और महिला अधिकारों को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि कानून मौजूद हैं, योजनाएं चल रही हैं और महिला सशक्तीकरण को राष्ट्रीय एजेंडा बनाया जा चुका है, तो फिर महिलाओं के खिलाफ हिंसा क्यों नहीं रुक रही? आखिर क्यों घर से लेकर कार्यस्थल तक महिलाएं स्वयं को पूर्णतः सुरक्षित महसूस नहीं कर पातीं? हाल के वर्षों में दहेज हत्या और उत्पीड़न के अनेक मामले राष्ट्रीय चर्चा का विषय बने हैं। यह विडंबना ही है कि एक लड़की की शिक्षा, पालन-पोषण और विवाह पर भारी व्यय करने वाले माता-पिता को विवाह के समय अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जाता है।
यह केवल सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान पर सीधा आघात है। आज आवश्यकता इस बात की है कि महिला सशक्तीकरण को बहुआयामी दृष्टि से देखा जाए। महिलाओं के घरेलू श्रम को मान्यता देने के साथ-साथ उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। विद्यालयों और परिवारों में लैंगिक समानता के संस्कार विकसित किए जाएं। पुरुषों और लड़कों को भी इस परिवर्तन प्रक्रिया का भाग बनाया जाए। केवल महिलाओं को जागरूक करने से समस्या का समाधान नहीं होगा, समाज की सोच में परिवर्तन लाना होगा।





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