बढ़े साइबर सुरक्षा

राजीव त्यागी 
हाल के दिनों में दुनिया में साइबर अपराधों में वृद्धि, वैज्ञानिक डेटा का दुरुपयोग और एआई आधारित हथियारों का बोलबाला बढ़ा है। कह सकते हैं, पूरी दुनिया एआई को लेकर भय व आशंकाओं में जी रही है। अब इस बात की वकालत की जाने लगी है कि एआई को इंसानी नियंत्रण में रखने की जरूरत है। जो मानवीय मूल्यों की रक्षा और नैतिकता को अक्षुण्ण रखने के लिये भी जरूरी है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नियमन की दिशा में एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। निश्चय ही यह अमेरिकी नीतियों में बड़ा बदलावा है, क्योंकि अब तक चीन से आगे निकलने की होड़ में अमेरिकी तकनीकी कंपनियों को बेलगाम छूट दे रखी थी। 

अमेरिकी सरकार के इस नये आदेश के अनुसार अब अमेरिकी एआई कंपनियां अपने नये मॉडल को सार्वजनिक करने से पहले सरकार को समीक्षा के लिये तीन दिन तक का समय स्वेच्छा से देंगी। सरकार का एक समीक्षा केंद्र एआई मॉडल द्वारा खोजी गई तकनीक की सुरक्षा खामियों की समीक्षा करेगा। निस्संदेह, यह पहल उन पुराने प्रस्तावों से अलग है जो प्रमुख एआई मॉडलों को सरकारी नियंत्रण में लाने की बात करते थे। यह एक अनिवार्य जांच प्रक्रिया होगी। वैसे भी तकनीकी कंपनियों पर इस बात के लिये भरोसा नहीं किया जा सकता कि वे खुद नियंत्रण की पहल करेंगी। हालांकि, अमेरिका में एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि इस नियमन से अमेरिका की तकनीकी बढ़त कम हो सकती है। वे सरकारी दखल का विरोध कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर अमेरिकी अदालत में कुछ एआई कंपनियों को मानवीय जीवन में हस्तक्षेप के लिये कटघरे में खड़ा भी किया गया है।
 बहरहाल, अमेरिका में विरोध के बावजूद ट्रंप ने एआई को लेकर सतर्क रुख अपनाया है। हालांकि,इस पहल को पूरी तरह कारगर नहीं कहा जा सकता, लेकिन फिर भी नियमन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम जरूर है। दरअसल यह नई घोषणा विश्व स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है। कंपनी ने अप्रैल में दावा किया था कि उसकी नई खोज दुनिया के विभिन्न देशों की साइबर सुरक्षा की कमजोरियों की पहचान करने और उसका लाभ उठाने में सक्षम है। निश्चय ही इसके गंभीर परिणामों को लेकर पूरी दुनिया में असुरक्षा की भावना पैदा हुई है। एक तरफ दुनिया की तमाम सरकारें और व्यवसाय सॉफ्टवेयर प्रणालियों को सुरक्षित करने और सभी सुरक्षा उपाय लागू करने के दिशा में गंभीर प्रयास कर रहे हैं, वहीं नई एआई खोजों से व्यापक दुरुपयोग की आशंका पैदा हो गई हैं। यही वजह है कि दुनिया के देशों में लोगों में एआई को लेकर नकारात्मक धारणा बन रही है। 
एक तो रोजगार के अवसरों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर पहले ही चिंता व्यक्त की जा रही हैं, दूसरी ओर नई सेंधमारी की आशंकाएं उसे और गंभीर बना रही हैं। यही वजह है कि आम लोगों में इस ताकतवर तकनीक को लाभ के बजाय हानि के रूप में देखा जा रहा है। बहरहाल, भारत के लिये अमेरिकी रणनीति में बदलाव एक बड़ा सबक है। भारत को भी इसी तरह से अधिक साइबर सुरक्षा बढ़ाने और एआई पेशेवरों को नियुक्त करने की जरूरत होगी। हमारे लिये बुनियादी ढांचे का संचालन करने वाले संस्थानों में मजबूत में मजबूत साइबर सुरक्षा प्रणालियों को सुनिश्चित करना जरूरी होगा।

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