मेरठ के डॉ. योगेन्द्र नारायण की 'सत्ता के राजनैतिक खेल' पुस्तक रिलीज
पुस्तक में खोले ब्यूरोक्रेसी के राज,आत्मकथा में जिले के प्रशासनिक अनुभव का जिक्र
रक्षा सचिव से लेकर राज्यसभा महासचिव तक के अनुभव की आत्मकथा
मेरठ। मेरठ में जन्मे व मुजफ्फरनगर में दो बार जिलाधिकारी (डीएम) के रूप में तैनात रहकर जनता के दिलों में अपनी खास पहचान बनाने वाले देश के वरिष्ठ पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉ. योगेन्द्र नारायण ने अपने जीवन के अनुभवों को किताब की शक्ल दे दी है। उनके 84वें जन्मदिन के अवसर पर उनकी आत्मकथा 'समर्पित जन सेवा: सत्ता के राजनैतिक खेल' का भव्य लोकार्पण किया गया। इस पुस्तक में उन्होंने अपने जन्म, शिक्षा, प्रशासनिक उतार-चढ़ाव और राजनीति के परदे के पीछे चलने वाले 'नूरा-कुश्ती' के खेलों का बेबाकी से जिक्र किया है।
मूल रूप से 26 जून 1942 को मेरठ में श्री कृपा नारायण माथुर के परिवार में जन्मे योगेन्द्र नारायण की शुरुआती परवरिश और उच्च शिक्षा प्रयागराज (इलाहाबाद) में हुई। कुशाग्र बुद्धि के धनी योगेन्द्र नारायण ने माता-पिता की इच्छा का मान रखते हुए सिविल सर्विसेज की परीक्षा दी। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने देश की दोनों सर्वोच्च सेवाओं-आईएफएस (भारतीय विदेश सेवा) में 9वीं रैंक और आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) में 10वीं रैंक हासिल की। हालांकि, देश की जमीनी जनता से जुड़कर काम करने के संकल्प के कारण उन्होंने आईएएस को चुना।
वर्ष 1965 से जनसेवा को प्राथमिकता देने वाले डॉ. योगेन्द्र नारायण का मुजफ्फरनगर से बेहद खास और भावुक रिश्ता रहा। वे यहां दो बार जिलाधिकारी रहे। अख़बार की शैली में लिखी इस किताब में उन्होंने मुजफ्फरनगर के उस दौर का जिक्र किया है जब देश आपातकाल की आग में झुलस रहा था। उन्होंने लिखा कि किस तरह उन्होंने मुजफ्फरनगर के कुख्यात नसबंदी कांड के पीड़ितों के बीच जाकर उनका दर्द बांटा और मरहम लगाया। वहीं, दूसरी तरफ प्रशासनिक दायित्वों का कड़ाई से पालन करते हुए आपातकाल के दौरान उन्होंने उन राजनेताओं को भी जेल भेजा, जिनके साथ वे कभी मिलकर काम कर चुके थे। मुजफ्फरनगर पोस्टिंग के दौरान उन्होंने जिले के दो बेहद रसूखदार और ताकतवर नेताओं के सियासी चक्रव्यूह को अपनी प्रशासनिक सूझबूझ से कैसे ध्वस्त किया, इसकी पूरी कहानी किताब में दर्ज है।
यूपी के मुख्य सचिव से लेकर राज्यसभा के महासचिव तक का सफर
डॉ. योगेन्द्र नारायण का प्रशासनिक करियर सिर्फ जिलों तक सीमित नहीं रहा। वे मुजफ्फरनगर, अलीगढ़ और लखनऊ जैसे चुनौतीपूर्ण जिलों में प्रशासनिक कमान यानी (डीएम) रहने के बाद वे उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव बने। इसके बाद उन्होंने केंद्र का रुख किया, जहां उन्होंने भारत के रक्षा सचिव और राज्यसभा के महासचिव जैसे लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण और शीर्ष पदों की जिम्मेदारी संभाली।
बंटवारा, हाईवे का निर्माण और एक फिल्म स्टार से 'नूरा कुश्ती'
किताब में कई ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ हैं जो देश के विकास की कहानी कहते हैं। डॉ. नारायण को नेशनल हाईवे अथॉरिटी (एनएचएआई) का संस्थापक बनने का गौरव प्राप्त है, जिसने देश की सड़कों की सूरत बदली। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के विभाजन के समय उत्तराखंड को उसका हक और हिस्सा दिलाने की जटिल जिम्मेदारी भी उन्होंने बखूबी निभाई। उन्होंने हाशिए पर मौजूद 'बावरिया समुदाय' के सामाजिक उत्थान के लिए भी बड़े फैसले लिए। किताब का एक बेहद रोचक हिस्सा एक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता के साथ उनके प्रशासनिक टकराव (नूरा कुश्ती) को लेकर है, जिसने नौकरशाही और बॉलीवुड के रसूख के बीच की कशमकश को उजागर किया है।
किताब का संदेश
डॉ. योगेन्द्र नारायण की यह आत्मकथा केवल एक आईएएस अधिकारी के संस्मरण नहीं हैं, बल्कि यह बीते छह दशकों के भारतीय प्रशासन, राजनीतिक दबावों के बीच ईमानदारी से काम करने की कला और देश के नीति-निर्माण की अंदरूनी गाथा है। खेल और घुड़सवारी के शौकीन रहे डॉ. नारायण ने अपनी इस कृति में सब कुछ साफ-साफ खोलकर रख दिया है।


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