उबलती धरती और सत्तावादी महत्वाकांक्षा


- संजीव ठाकुर

ग्लोबल वार्मिंग आज कोई वैज्ञानिक कल्पना नहीं, बल्कि एक कठोर यथार्थ है। पृथ्वी का औसत तापमान निरंतर बढ़ रहा है। कभी असहनीय गर्मी लोगों का जीवन संकट में डाल देती है, तो कभी अचानक होने वाली अतिवृष्टि शहरों और गाँवों को जलमग्न कर देती है। कहीं अनावृष्टि के कारण खेत सूख रहे हैं, तो कहीं बाढ़ किसानों की वर्षों की मेहनत बहाकर ले जा रही है। ऋतुओं का स्वाभाविक चक्र अव्यवस्थित हो चुका है। बसंत और शरद जैसे मधुर मौसम सिमटते जा रहे हैं, जबकि गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। प्रकृति बार-बार चेतावनी दे रही है कि विकास की अंधी दौड़ में हमने उसके साथ अन्याय किया है।
जंगलों की कटाई, औद्योगिक प्रदूषण, जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन पृथ्वी को धीरे-धीरे बीमार बना रहा है। कभी हिमालय की चोटियाँ समय से पहले पिघलने लगती हैं, तो कभी समुद्र का बढ़ता जलस्तर तटीय क्षेत्रों के लिए खतरा बन जाता है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का संकट है।        

मानव सभ्यता आज ऐसे दोहरे संकट के दौर से गुजर रही है, जहाँ एक ओर प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है और दूसरी ओर राजनीति की महत्वाकांक्षाएँ विश्व में वैमनस्य, संघर्ष और अविश्वास का वातावरण निर्मित कर रही हैं। धरती का तापमान बढ़ रहा है, ऋतुओं का स्वभाव बदल रहा है, नदियाँ अपने प्रवाह से भटक रही हैं, और दूसरी तरफ राष्ट्र अपनी शक्ति, प्रभुत्व और विस्तारवादी नीतियों के कारण मानवता को युद्धों के मुहाने पर खड़ा कर रहे हैं। यदि समय रहते इन दोनों संकटों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो भविष्य की पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। दूसरी ओर, विश्व राजनीति का परिदृश्य भी कम चिंताजनक नहीं है। वैश्विक मंच पर सहयोग और सहअस्तित्व की भावना कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। अनेक देशों के बीच अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की होड़ बढ़ती जा रही है। युद्धों और संघर्षों की विभीषिका ने करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित किया है। कहीं सीमाओं के विस्तार की आकांक्षा है, कहीं सामरिक प्रभुत्व की लालसा, तो कहीं आर्थिक हितों की रक्षा के नाम पर संघर्षों को बढ़ावा दिया जा रहा है। जब राष्ट्र अपनी ऊर्जा शांति, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण पर लगाने के बजाय हथियारों और युद्ध की तैयारियों में खर्च करते हैं, तब मानवता का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। युद्ध केवल सैनिकों को नहीं मारते, वे आने वाली पीढ़ियों के सपनों को भी नष्ट कर देते हैं।



विस्फोटों से केवल शहर नहीं टूटते, बल्कि मनुष्यों के भीतर विश्वास और करुणा भी खंडित हो जाती है। नफ़रत और ईर्ष्या का यह वातावरण समाजों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। मुसीबत यह है कि जिस समय पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन जैसी साझा चुनौती का सामना करने के लिए एकजुट होना चाहिए, उसी समय राजनीतिक मतभेद और भू-राजनीतिक संघर्ष देशों को विभाजित कर रहे हैं। प्रकृति के सामने  विकसित विकासशील देश एक समान है प्रकृति किसी से भेदभाव नहीं करती। बढ़ता तापमान, सूखा, बाढ़ और प्रदूषण सभी को समान रूप से प्रभावित करते हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण और विश्व शांति एक-दूसरे के पूरक विषय हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व नेतृत्व संकीर्ण राजनीतिक मानसिकता के हितों से ऊपर उठकर मानवता के व्यापक हितों के बारे में सोचे।
पृथ्वी किसी एक राष्ट्र की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति की साझा धरोहर है। यदि जंगल बचेंगे, नदियाँ स्वच्छ रहेंगी, वायुमंडल संतुलित रहेगा और समाजों में शांति कायम होगी, तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रह सकेगा। हमें यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि पृथ्वी का विनाश किसी एक दिन नहीं होगा। वह धीरे-धीरे हमारी गलत नीतियों, हमारी उदासीनता और हमारी स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों के कारण होगा। प्रकृति के विरुद्ध अपराध और मानवता के विरुद्ध नफ़रत, दोनों मिलकर उस कथा की रचना कर रहे हैं जिसका अंत सुखद नहीं हो सकता। इसलिए अभी भी समय है कि हम चेत जाएँ। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करें, युद्ध और वैमनस्य के स्थान पर संवाद और सहयोग को बढ़ावा दें तथा पृथ्वी को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता माँ के रूप में देखें।

अंततः इतिहास यह याद नहीं रखेगा कि किस राष्ट्र ने कितने हथियार बनाए या किसने कितने क्षेत्रों पर प्रभाव स्थापित किया। इतिहास यह याद रखेगा कि संकट की उस घड़ी में मानवता ने पृथ्वी और अपने भविष्य को बचाने के लिए क्या प्रयास किए। यदि हम आज भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियाँ शायद यह लिखेंगी कि मनुष्य ने अपने ज्ञान और विज्ञान से विकास तो किया, लेकिन विवेक और संवेदना की कमी के कारण अपनी ही सभ्यता के अंत की कथा भी स्वयं लिख दी है।
(लेखक, रायपुर, छत्तीसगढ़)

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