सूखा: बने प्रभावी नीति

 राजीव त्यागी 
दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की कमजोरी के चलते कृषि क्षेत्र के सामने सूखे की चुनौती पैदा होने की आशंका मजबूत हुई है। दरअसल, कम बारिश से केवल किसान व ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही प्रभावित नहीं होती है, बल्कि खाद्यान्न की उत्पादकता घटने पर आम आदमी का जीवन भी बाधित होता है। फिलहाल बारिश में चालीस से छियालीस प्रतिशत की कमी मापी गई है। 

देश के मौसम विज्ञान विभाग द्वारा दो जुलाई तक मानसून की सक्रियता कम रहने के अनुमान के कारण खरीफ की फसल को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। केंद्र सरकार ने कम बारिश वाले 315 जिलों में से 111 ऐसे जिलों की पहचान की है, जो सूखे की दृष्टि से ज्यादा जोखिम वाले हो सकते हैं। जो आसन्न संकट की गंभीरता को भी दर्शाता है। यह विडंबना ही है कि तमाम सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के बावजूद आज देश में खेती की मॉनसून की बारिश पर निर्भरता बनी हुई है। 

यही वजह है कि मॉनसून में देरी या कम बारिश होने का सीधा असर फसल की बुवाई, खाद्यान्न की पैदावार, ग्रामीणों की आय और खाने-पीने की वस्तुओं की महंगाई के रूप में पड़ता है। ऐसे में यदि जुलाई व अगस्त माह के महत्वपूर्ण समय में बारिश सामान्य से कम होती है तो इसके परिणाम चिंता बढ़ाने वाले हो सकते हैं। केंद्र सरकार राज्य और जिले स्तर पर आपातकालीन योजनाएं तैयार कर रही है। सरकार सूखे में भी बेहतर उत्पादन कर सकने वाली फसलों को बढ़ावा देने के साथ ही जल संरक्षण पर जोर दे रही है। आज जरूरत इस बात की है कि सूखे की आशंका के बीच जल संकट से मुकाबले के लिये एक प्रभावी समग्र नीति बने। 

समय-समय पर इन नीतियों में सुधार किया जाए। जरूरी है कि जलवायु परिर्वतन संकट के दौर में मानसून के व्यवहार में अनिश्चितता के बीच खेती की बारिश पर निर्भरता को कम करने के लिये व्यापक रणनीति तैयार की जाए। इसके लिये जरूरी है कि सूक्ष्म-सिंचाई सुविधा का विस्तार, जल निकायों के पुनरुद्धार, भूजल प्रबंधन को बेहतर बनाने और जलवायु के अनुरूप खेती को बढ़ावा देने के प्रयास हों। 

हमें किसानों को आर्थिक संकट से उबारने को अपनी वरीयता सूची में शामिल करना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में मौसम के मिजाज में होने वाला बदलाव अब कभी-कभार की बाधा नहीं रही, बल्कि बार-बार होने वाली सच्चाई बन गया है। मानसून के व्यवहार में लगातार अनिश्चितता को देखते हुए देश के नीति-निर्माताओं को खेती संरक्षण के लिये एक ऐसा तंत्र बनाने की जरूरत है, जो मौसम के बदलावों का बेहतर ढंग से मुकाबला कर सके। 

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