सुकून
रामसिंह अपने खेत में हल चला रहा था। पत्नी देवकुँवर आई। खाना खाने के लिए रामसिंह को आवाज लगाई। रामसिंह ने हल को खड़ा किया। बैलों को भी जुड़े से अलग किया। खेत के ही पानी से हाथ धोए।
तभी देवकुँवर ने देखा कि वह जमीन पर गिरे अन्न के एक-एक दाने और सब्जी को उठा कर खा रहा है। दाने व सब्जी से चिपके हुए धूल-मिट्टी को झड़ा लेता है। कुछ देर तक देखती रही; फिर बोली- 'कुसुम के बाबू, क्यों खा रहे हो धूल-मिट्टी सने हुए को ?'
रामसिंह ने मुँह में डाले हुए कौर को निगला। मुस्कुराते हुए बोला- 'देवकुँवर ! मैं भी मिट्टी से ही तो बना हूँ; और तुम भी। हम सदैव मिट्टी से जुड़े रहे हैं। मिट्टी ही हमारी सब कुछ है। एक दिन हमें इसी मिट्टी में ही मिल जाना है।'
फिर मिट्टी की कटोरी को मुँह से टिका कर सब्जी का चटकारा लेते हुए रामसिंह बोला- 'सच, बड़ा सुकून मिलता है देवकुँवर, इस तरह खेत में बैठ कर खाने में। मैं सोचता हूँ कि यह सौभाग्य मुझे बार-बार मिलता रहे।'
अपने पति रामसिंह का सुकूनभरा चेहरा देख देवकुँवर को बड़ा सुकून मिल रहा था।





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