बिखरते रिश्ते

राजीव त्यागी 
किसी समय गांवों की चौपालों में रिश्तों की गर्माहट दिखाई देती थी। परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं था, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा और सम्मान का आधार माना जाता था। दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची और भाई-बहन मिलकर एक ऐसी सामाजिक संरचना बनाते थे, जहाँ व्यक्ति अकेला नहीं पड़ता था। परिवार की खुशियाँ सामूहिक होती थीं और दुख भी मिलकर सहन किए जाते थे। लेकिन बदलते समय के साथ समाज की तस्वीर तेजी से बदली है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, शहरीकरण, बढ़ती भौतिक इच्छाएँ और उपभोक्तावादी सोच ने रिश्तों की आत्मीयता को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया है। 

अब वही परिवार, जो कभी प्रेम और सहयोग की मिसाल होते थे, संपत्ति और पैसों के विवादों में टूटते दिखाई दे रहे हैं। जमीन का छोटा-सा टुकड़ा, विरासत का हिस्सा या पैसों का लेन-देन कई बार ऐसे संघर्षों को जन्म दे रहा है, जिनका अंत हिंसा और हत्या तक पहुँच रहा है। यह घटनाएँ केवल अपराध नहीं हैं, बल्कि समाज के भीतर बढ़ते नैतिक पतन का संकेत हैं। परिवारों के भीतर बढ़ती यह हिंसा बताती है कि धन और संपत्ति अब रिश्तों से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाने लगी है। संयुक्त परिवारों के टूटने ने भी इस समस्या को गंभीर बनाया है। पहले परिवार में बड़े-बुजुर्ग मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। 
यदि किसी बात को लेकर विवाद होता, तो परिवार के सम्मानित सदस्य बैठकर समाधान निकाल लेते थे। उनकी बात को अंतिम माना जाता था। लेकिन अब एकल परिवारों का चलन बढ़ गया है। परिवार छोटे होते गए और संवाद भी कम होता गया। जब परिवार के सदस्य अलग-अलग रहने लगे, तब उनके बीच भावनात्मक दूरी भी बढ़ी। यही दूरी कई बार अविश्वास और स्वार्थ को जन्म देती है। आधुनिक समाज में व्यक्ति की सफलता को उसकी आर्थिक स्थिति से मापा जाने लगा है। बड़ा घर, महंगी गाड़ी और अधिक संपत्ति आज सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुके हैं। सोशल मीडिया और बाजारवादी संस्कृति ने इस सोच को और मजबूत किया है। 

हर व्यक्ति अधिक से अधिक धन कमाने की दौड़ में शामिल दिखाई देता है। इस दौड़ में रिश्तों की संवेदनशीलता पीछे छूटती जा रही है।  मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो संपत्ति विवाद केवल आर्थिक संघर्ष नहीं होते। इनके पीछे असुरक्षा, अहंकार, तुलना और अधिकार की भावना भी काम करती है। कई बार व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, उसे कम हिस्सा मिला है या परिवार में उसकी उपेक्षा हुई है। यही भावनाएँ धीरे-धीरे क्रोध और हिंसा में बदल जाती हैं। परिवार के भीतर वर्षों से दबा तनाव किसी छोटे विवाद के समय विस्फोटक रूप ले लेता है।

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