दल-बदल से उठते सवाल

 राजीव त्यागी 
भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है। अतीत में भी दल-बदल होते रहे हैं। हरियाणा में तो तकरीबन पूरा विधायक दल ही दूसरे दल में समा गया था। उसी के बाद से दल बदल के लिए भारतीय राजनीति में ‘आयाराम गयाराम’ का मुहावरा ही चल पड़ा था। लेकिन इस समय जिस तरह दल-बदल या दलों में टूट फूट हो रही है, वह अप्रत्याशित है। 
इतने बड़े पैमाने पर राजनीतिक दलों में भगदड़ पहले नहीं हुई थी। पहले किसी एक या दो दल में ऐसा होता था। ऐसा लग रहा है कि जैसे बीजेपी विरोधी दलों को दल-बदल या टूट-फूट वाली छूत की बीमारी लग गई है। इस प्रभावित दल इस टूट-फूट के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका आरोप है कि बीजेपी टूटने वाले नेताओं को मोटी रकम का लालच दे रही है। 

एक बारगी मान भी लें कि बीजेपी की शह पर ये टूट-फूट हो रही है तो एक प्रश्न जरूर उठता है कि आखिर राजनीतिक दलों ने कैसे नेताओं को अपना सांसद या विधायक बनाने के लिए चुना है? क्या उनके चयन में कोई गलती रही? सवाल यह भी उठता है कि जो टूट रहे हैं, क्या सांसद या विधायक बनाने को लेकर जब उनका चयन किया जा रहा था, तो उनकी कौन सी खासियत देखी गई थी? क्या दल के प्रति न उनकी निष्ठा, उनके चरित्र आदि का ध्यान नहीं रखा गया। सवाल यह भी उठता है कि क्या बाहुबल या धन बल ही उनके चयन की बड़ी योग्यता मानी गई। इन सवालों का ईमानदारी से जवाब प्रभावित दल भले ही नहीं दे, लेकिन यह छुपी हुई बात नहीं है कि भारतीय राजनीति में संसद या विधानसभा में नुमाइंदगी के लिए दलीय निष्ठा की बजाय दूसरे कारकों का ज्यादा ध्यान रखा जा रहा है।

 टूट रहे सांसदों को लेकर आरोप लगाने वाले दलों को भी सोचना होगा कि आखिर उन्होंने किस तरह के लोगों को चुना? सवाल यह है कि जब पैसे लेकर टिकट दिए जाएंगे, जब दल और विचारधारा की निष्ठा के बजाय चुनावी टिकट हासिल करने के अन्य कारण होंगे तो फिर इस प्रक्रिया से चुनकर आए सांसदों और विधायकों की खऱीद-बिक्री पर सवाल कैसे उठाए जा सकते हैं? बहरहाल दलीय टूट-फूट का अभी कोई बड़ा नुकसान भले ही नहीं दिख रहा हो, लेकिन आने वाले दिनों में इसका एक बड़ा हश्र लोक विश्वास के दरकने के रूप में दिख सकता है। आज का मतदाता बहुविध सूचनाओं के तमाम स्रोतों से लैस है।

 उसकी राजनीतिक समझ पहले के मीडिया क्रांति के दौर के पहले के मतदाताओं की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित है। उसका सामान्य ज्ञान कमजोर भले ही हो सकता है, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और उसमें आ रहे निष्ठागत बदलावों की पृष्ठभूमि को वह समझ रहा है। ऐसे में उसका भरोसा मौजूदा राजनीतिक तंत्र से चूक सकता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया से उसका भरोसा टूटना लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है।

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