बुजुर्गों का हक

 राजीव त्यागी 

आज की आत्मकेंद्रित होती नई पीढ़ी के दौर में बुजुर्गों खासतौैर से मां-बाप की बेकद्री विचलित करने वाली है। यह विडंबना ही है कि उन मां-बाप की देखभाल करने का निर्देश अदालत को देना पड़ रहा है, जिनका ऋण वे कभी चुका ही नहीं सकते। मां के रक्त से सींचे गए और पिता की पसीने से पले-बढ़े बेटे से यदि अदालत को कहना पड़े कि ‘मां को घर में रहने के लिये एक कमरा, अलग बाथरूम और बुनियादी सुविधाएं दी जाएं’, तो यह बात शर्मसार करने वाली है।

 इस तरह के घटनाक्रम हमारे समाज की बेहद कष्टदायक होती तस्वीर को ही उकेरता है। सामान्य तौर पर मां-बाप अपना पेट काटकर, अपने सुख-सुविधाओं पर समझौता कर, बच्चों को बेहतर से बेहतर देने का प्रयास करते हैं। एक मां-बाप ही होते हैं जो सच्चे मन से अपने बच्चों की तरक्की चाहते हैं। ऐसी पढ़ी-लिखी संतानों से अनपढ़ संतानें बेहतर हैं, जो कम से कम अपने वृद्ध माता-पिता के पास रहकर उनका ख्याल तो रखती हैं। 

यह सवाल परेशान करने वाला है कि जिस समाज में ‘मातृ देवो भव’ की सर्वस्वीकार्य मान्यता रही हो, वहां मां-बाप की बेकद्री होना सामान्य बात नहीं है। यदि हालात ऐसे ही रहे तो बहुत संभव है भारत में भी पश्चिमी देशों जैस चलन शुरू हो जाएगा, जहां मां-बाप बच्चों को होश संभालने के बाद ही उन्हें पैरों पर खड़ा होने के लिये चलता कर देते हैं। दरअसल, पश्चिमी देशों में मां-बाप मानकर चलते हैं कि बड़े होकर बच्चे उनकी देखभाल नहीं करेंगे, अत: इनसे पहले ही किनारा कर लो। 

आधुनिकता व तरक्की की लाख इबारतें लिख ली जाएं, भारतीय समाज कभी पश्चिमी समाज की तर्ज पर नहीं चल सकता। समाज में आई विकृतियां महानगरीय संस्कृति की भी देन हैं। बच्चों की भी अपनी दुश्वारियां हैं। फिर भी भारतीय संस्कृति में वो शक्ति है जो पारिवारिक मूल्यों को सींचती है। बहरहाल, माता-पिता की सेवा-सम्मान व बुढ़ापे में उनकी देखभाल करना महज एक सांस्कृतिक दिखावा नहीं है बल्कि संतानों का नैतिक-कानूनी दायित्व भी है। 

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