पर्यावरण संरक्षण पर हों गंभीर
राजीव त्यागी
भारत में मौसम का बदलता मिजाज और वैशाख के महीने में जेठ जैसी तपिश का अहसास होना अब केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरे पारिस्थितिक संकट की चेतावनी है। हमें विकास की अपनी परिभाषा को बदलना होगा। बुंदेलखंड में पत्थर खनन के लिए काटी गई हर पहाड़ी और उत्तराखंड में कंक्रीट के विस्तार के लिए नष्ट की गई हरियाली हमारे भविष्य की ठंडी हवाओं को रोक रही है। आर्थिक लाभ की तुलना में गर्मी के कारण होने वाला स्वास्थ्य और कृषि का नुकसान कहीं अधिक है।
भविष्य की नीतियों की सफलता अब इस जवाबदेही पर टिकी है कि हम बुनियादी ढांचे के निर्माण में ‘ग्रीन इंजीनियरिंग’ को कितनी प्राथमिकता देते हैं और पर्यावरण नियमों की अनदेखी को कब बंद करते हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पर्यावरण का संरक्षण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। अक्सर भीषण गर्मी और लू के लिए अल नीनो या वैश्विक जलवायु परिवर्तन को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बचते रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह संकट काफी हद तक मानव-निर्मित है। आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है।
जब हम अपनी विकास योजनाओं के नाम पर हज़ारों हेक्टेयर प्राथमिक जंगलों, पहाड़ियों और जल निकायों को नष्ट करते हैं, तो हम अनजाने में उन प्राकृतिक ‘कूलिंग एजेंटों’ को खत्म कर देते हैं जो इस तपिश के खिलाफ हमारी एकमात्र सुरक्षा थे। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में, जहां तापमान अब नियमित रूप से 48 डिग्री सेल्सियस के स्तर को छूने लगा है, यह स्पष्ट है कि हमारी विकास की भूख ने धरती के प्राकृतिक थर्मोस्टेट को बिगाड़ दिया है।
मिट्टी की नमी खत्म होने से उपजाऊ जमीन अब मरुस्थल में बदल रही है, फिर भी हमारी नीतियां सूखे क्षेत्रों में अधिक पानी चाहने वाली फसलों को बढ़ावा दे रही हैं। अब समय आ गया है कि नीतिगत स्तर पर ‘वन हेल्थ’ के दृष्टिकोण को अपनाया जाए, जहां मिट्टी की नमी, पशुधन का स्वास्थ्य और वन्यजीवों का संरक्षण एक ही इकाई के रूप में देखा जाए।





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