कठघरे में है राजनीतिक दलों की ईमानदारी
राजीव त्यागी 

सभी पार्टियां राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का एक मत से समर्थन करती हैं। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किए जाने के लिए तैंतीस फीसद आरक्षण का विधेयक पारित कराने में भी सभी दलों की भूमिका रही। मगर महिलाओं की नुमाइंदगी के सवाल पर संजीदा दिखने वाली लगभग सभी पार्टियां क्या तब तक इस मुद्दे पर ठोस पहल नहीं करेंगी, जब तक विधायिका में आरक्षण की व्यवस्था व्यवहार में लागू न हो जाए ?

 आखिर क्या वजह है कि देश में लोकसभा या फिर विधानसभा के लिए जब भी चुनाव होते हैं, तो उसमें पर्याप्त संख्या में महिलाओं को टिकट देने को लेकर ईमानदार इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है? चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियों की ओर से जितनी महिलाओं को टिकट दिया गया और उनमें जीतने वालों की जो संख्या रही, वह महिला भागीदारी के सवाल पर राजनीतिक दलों के प्रचारित सरोकार के प्रति ईमानदारी को कठघरे में खड़ा करती है। दरअसल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुचेरी में हुए चुनाव के दौरान कुल आठ सौ चौबीस सीटों पर चुनाव हुए। उनमें जीत हासिल करने वाली महिलाओं का अनुपात बेहद कम रहा। 

नतीजों के मुताबिक, इन पांचों प्रदेशों में कुल पांच फीसद सीटों पर ही महिलाएं चुनी गई। इन राज्यों में अलग-अलग पार्टियों ने महिलाओं को टिकट देने में भी अपने घोषित सरोकारों के उलट रवैया अपनाया। मसलन, पश्चिम बंगाल में दो सौ सात सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आने वाली भाजपा ने सभी 294 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन उसने सिर्फ तैंतीस सीटों पर महिलाओं को मौका दिया था। जबकि तृणमूल कांग्रेस ने अपनी उम्मीदवारी के 291 सीटों में से 52 महिलाओं को टिकट दिया था। नतीजतन, राज्य की कुल सीटों में से सिर्फ दस फीसद महिलाएं जीत सकीं। दूसरी ओर, तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा बदलाव हुआ, जहां सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी टीवीके 234 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन उसने सिर्फ चौबीस महिलाओं को उम्मीदवार बनाया था। 

असम में फिर से जीतने वाली भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने 126 सीटों में से केवल छह महिलाओं को टिकट दिया। केरल में जीत हासिल करने वाली यूडीएफ ने सिर्फ दस महिलाओं को मौका दिया। जाहिर है, तकरीबन सभी पार्टियों ने महिलाओं को उम्मीदवार बनाने में कोई खास उत्साह नहीं दिखाया। हालांकि हाल ही में संसद में परिसीमन विधेयक पारित न होने के संदर्भ में महिला आरक्षण का सवाल चुनावी राजनीति का भी मुद्दा बना और भाजपा की ओर से इस मसले पर विपक्षी दलों पर सवाल उठाए गए। 

विडंबना यह है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के घोषित दावों के बरक्स टिकट देने के मामले में भाजपा सहित सभी पार्टियों के भीतर इच्छाशक्ति की कमी दिखती है। क्या यही सबसे बड़ी वजह नहीं है कि विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने और एक न्यायपूर्ण संतुलन के लिए आरक्षण की जरूरत पड़ी? महज औपचारिकता पूरी करने के लिए किसी महिला को टिकट देना सरोकारों के प्रति ईमानदारी को नहीं दर्शाता है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि महिला आरक्षण की व्यवस्था को जल्द लागू किया जाए और उसके समांतर सभी राजनीतिक दलों की ओर से महिलाओं को अधिकार के रूप में ज्यादा से ज्यादा अवसर देने को लेकर ईमानदारी से पहल हो।

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