जियते फूंक देबा का मालिक...!  


- प्रो. नंदलाल
प्रचंड गर्मी का मौसम चल रहा है।जन जीवन अस्त व्यस्त हो चला है।एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत के अड़तीस शहरों में तापमान पैंतालीस-छियालीस के ऊपर चल रहा है। भारत के लगभग विशेषकर उत्तर पश्चिम भारत के शहर जबरदस्त लू के चपेट में हैं। बार-बार चेतावनी जारी की जा रही है कि विशेष स्थिति में ही घर से बाहर निकलें। दस बजे से तीन चार बजे तक घर के अंदर रहें।जीव जंतु सभी परेशान हैं। इसका शीघ्र समाधान भी नहीं दिख रहा है।
एक बनारसी व्यक्ति गर्मी की तड़पड़ाहट में स्वाभाविक रूप से सूरज की तरफ देखते हुए कहता है "ज़ियते फूंक देबा का मालिक"। उसकी बात पर सोचने को मन करता है कि मौसम में इतना परिवर्तन कैसे हो रहा है कि नगर, गांव, घर, दुकान, जंगल, जमीन, धरती आसमान सभी जल रहे हैं।यह प्रकृति का कहर सामान्य है या असामान्य यह अपनी आंखों से हम लोग देख रहे हैं। इसके पीछे मानव का षडयंत्र है। प्रकृति पर विजय पाने की होड़ में मानव ने न जाने कौन कौन समझौते कर लिए है कि प्रकृति का प्रकोप उसी तेज गति से बढ़ रहा है जिस गति से हमारे दिमाग द्वारा सृजित कृत्रिम बुद्धि और मशीन लर्निंग की तकनीक आगे आगे चल रही है।हमने वे सभी उपकरण विकसित कर लिए  जो मनुष्य को दर किनार करते हैं और अपना आधिपत्य स्थापित करते हैं।
मानव को रिप्लेस करने वाली तकनीक और अभियांत्रिकी ने मनुष्य को गहरे कुएं में धकेल दिया है फिर भी हम सतर्क नहीं हो पा रहे हैं और उन उपकरणों का परिष्कृत और उच्च वर्जन लाने के फिराक में रहते हैं जो मानव जीवन और सभ्यता को खतरे में डाल रहे हैं। बांदा जिला कल यानि बीस मई छब्बीस को विश्व का सबसे गर्म स्थान रहा जो आश्चर्य में डालता है।
बांदा के पर्यावरण में ऐसा क्या परिवर्तन हो गया है जिससे बांदा विश्व का सर्वाधिक गर्म स्थान रिकॉर्ड हुआ। तो इसकी कहानी बहुत पुरानी नहीं है।सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बार बार बांदा के निवासियों और अधिकारियों का ध्यान खींचना चाहा कि बांदा में पहाड़ों, नदियों, वृक्षों, को खोद-खोद कर खोखला कर दिया। बालू माफिया, खनिज माफिया, पत्थर माफियाओं ने बांदा को नंगा और खोखला कर दिया जिस कारण आज यह दिन देखना पड़ रहा है।
इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को कौन-कौन यातनाएं नहीं दी गईं। इन्हें क्या-क्या नहीं सहना पड़ा। अधिकारियों के कान पर जूं भी नहीं रेंगता पर सब खेल चल रहा है। परिणाम हमारे और आपके सामने है। सड़कों का जाल बिछ रहा है पर किस कीमत पर इसका अंदाजा सामान्य लोगों को नहीं है। न जाने कितने पुराने और भारी भारी पेड़ों की कटाई कर दी गई जो अब लगाने से भी नहीं लगेंगे। महुआ, गूलर, वयोवृद्ध पीपल के बड़े बड़े पेड़, बरगद, पाकड़, आम, जामुन सभी की निर्मम हत्या कर दी गई किसलिए एक्सप्रेसवे बन रहे हैं और अंधाधुंध टोल टैक्स वसूले जा रहे हैं। हम विकास के पथ पर अग्रसर हैं।
     
पहले लोग गर्मी में गर्मी और पसीने के लिए हाथ के पंखे प्रयोग में लाते थे।हम विकास में आगे बढ़े और टेबल फैन तथा सीलिंग फैन फैशन में आ गए। गर्मी और बढ़ी या हमारी क्षमता घटी तो कूलर प्रचलन में आ गए। अब कूलर भी काम नहीं आ रहे तो एसी का आगमन हो गया और पहले एसी बड़े बड़े घरों में ही होता था पर अब इसकी संख्या और उपयोगकर्ता भी काफी बढ़ गए। यह अच्छी बात हो सकती है कि एसी खरीदने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है पर उसी के साथ उनसे निकलने वाली गर्म हवा वातावरण के तापमान को और अधिक प्रदूषित तथा हीट कर देती है। फ़लतः वायु मंडलीय दबाव और ऊष्मा अधिक बढ़ जाती है।यह वातावरणीय संतुलन को काफी खतरा पहुंचा रहा है।

पैदल चलना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक माना जाता है। लोग पैदल चलते थे। कोसों पैदल चला करते थे लोग। पर साइकिल के आविष्कार ने लोगों के लिए थोड़ी सहूलियत दी। फिर भी वह स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। बिना किसी खर्च के शारीरिक श्रम हो जाता था पर स्कूटर, स्कूटी, बाइक, मोटर साइकिल सामान्य लोगों की शान का एक साधन हो गया है।अब हर स्तर का आदमी जिसके पास कोई आमदनी हो या न हो सभी उसे चला रहे हैं जिसमें पेट्रोल लगता है यानि खर्च भी होता है और शरीर को कोई लाभ नहीं मिलता। अब उससे भी काम नहीं चलता चार पहिया की गाड़ी सभी की चाहत बन गई है।
सड़कों पर लाखों लाख वाहन दौड़ रहे हैं। उनसे निकलने वाला धुआं जहां तापमान में वृद्धि करता है वही वह स्वास्थ्य के लिए घातक है। इस तरह हर क्षेत्र में उपकरणों और मशीनों के आ जाने से जहां शारीरिक श्रम कम हो गया है वही वह स्वास्थ्य और प्रकृति के लिए विनाशकारी सिद्ध हो रहा है।किसको दोष दिया जाय। मानव ही तो है जो झूठी शान के चक्कर में पर्यावरण को घोर क्षति पहुंचा रहा है। प्रकृति पर नियंत्रण आप नहीं कर सकते।प्रकृति समय समय पर करवट लेती है और अपने को बैलेंस करती है। तापमान में वृद्धि हमारी गलत जीवन शैली और गलत प्रत्यक्षीकरण के कारण हो रहा है। लेकिन मानव भी कहां रुकने वाला है। उसकी चाहतों का कभी अंत नहीं होता।लाख परेशानियां वह उठाता है पर अपनी चाहतों के साथ समझौता नहीं कर सकता।
रुक कर सोचिये, हमें अपने स्वस्थ जीवन की दरकार है।अपने व्यवहार, आचरण और जीवन शैली पर विचार करिए वरना ऐसी आफतों को झेलना हमारी नियति बन जाएगी।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)

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