हीटवेव की चुनौती
इलमा अज़ीम
अप्रैल-मई के दौरान भारत सहित दक्षिण एशिया के अनेक हिस्सों में पड़ी रिकॉर्ड हीटवेव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का संकट नहीं, वर्तमान की भयावह वास्तविकता है। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में तापमान 46 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। कई शहरों में बिजली की मांग ने रिकॉर्ड तोड़ दिए। यह दशकों से प्रकृति के साथ किए गए असंतुलित व्यवहार, अंधाधुंध शहरीकरण, जंगलों की कटाई, संसाधनों के दोहन और सुविधावादी जीवनशैली का परिणाम है।
प्रकृति ने बार-बार संकेत दिए, लेकिन विकास की अंधी दौड़ में हमने उन संकेतों को अनसुना किया। आज वही उपेक्षित चेतावनियां लू बनकर हमारे सामने खड़ी हैं। हीटवेव का सबसे बड़ा कारण केवल बढ़ता तापमान नहीं, बल्कि वह विकास मॉडल है जिसने धरती की प्राकृतिक ढाल को कमजोर कर दिया। जंगल सदियों से पृथ्वी के प्राकृतिक एयर कंडीशनर रहे हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, वाष्पोत्सर्जन द्वारा वातावरण को शीतल रखते हैं और वर्षा चक्र को संतुलित बनाए रखते हैं। लेकिन विडंबना है कि विकास के नाम पर जंगलों का तेजी से विनाश हुआ। हर वर्ष लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त हो रहे हैं।
इसका परिणाम यह हुआ कि स्थानीय स्तर पर तापमान बढ़ा, नमी कम हुई, वर्षा चक्र प्रभावित हुआ और गर्म हवाओं की अवधि लंबी होती गई। आज शहर “कंक्रीट के जंगल” बन चुके हैं। महानगरों में हरित क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं और उनकी जगह सीमेंट, डामर और शीशे की ऊंची इमारतें ले रही हैं। इससे “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव तेजी से बढ़ा है। शहर अब आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक गर्म हो चुके हैं। कंक्रीट दिनभर सूर्य की ऊष्मा को सोखता है और रात में धीरे-धीरे छोड़ता है।
परिणामस्वरूप रातें भी गर्म होती जा रही हैं और शरीर को राहत नहीं मिल पाती। दिल्ली, मुंबई, जयपुर और लखनऊ जैसे शहरों में रात का तापमान पहले की तुलना में लगातार बढ़ रहा है। गरीब बस्तियों में स्थिति और भी गंभीर है। वहां न हरित क्षेत्र हैं, न पर्याप्त जल आपूर्ति, न शीतलन के साधन। टीन की छतों वाले घर दिन में भट्ठी बन जाते हैं। गर्मी की मार सामाजिक असमानता को और गहरा करती है। अमीर वर्ग एयर कंडीशनर और बंद कमरों में राहत खोज लेता है, लेकिन मजदूर, रिक्शाचालक, रेहड़ी वाले और निर्माण कार्य में लगे श्रमिक खुले आसमान के नीचे झुलसते रहते हैं।





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