बेमौसम आंधी-बारिश से टूटी आम किसानों की कमर
बोले- मौसम का बदलाव आम के लिए जहर बना
लखनऊ (एजेंसी)।बेमौसम आए आंधी-तूफान और बूंदाबांदी ने आम किसानों को बेजार कर दिया है। प्रदेशभर में करीब 40 से 50 फीसदी आम की फसल को नुकसान हुआ है। एक तरफ किसान सिसक रहे हैं, वहीं कम उत्पादन की बजह से आम का स्वाद महंगा साबित होगा। हालांकि उद्यान विभाग किसानों के दर्द को कम करने की कोशिश में लगा है।
राजधानी की फलपट्टी मलिहाबाद के किसानों का कहना है कि हर साल एक एकड़ में करीब 90 से 100 क्विंटल आम निकलता था। यदि मूल्य 30 रुपये किलो रहा तो तीन लाख मिलते थे। खर्चा काट कर करीब डेढ़ से दो लाख रुपये बचते थे। इस बार आधी रकम मिलना भी मुश्किल है।
मलिहाबाद ही नहीं बल्कि प्रदेश के हर हिस्से में आम की फसल प्रभावित हुई है। बिजनौर में करीब 21 हजार हेक्टेयर में आम के बाग हैं। सहारनपुर के आम कारोबारी हाजी नसीम बताते हैं कि यहां 50 फीसदी फसल खराब हो गई है। यही हालात रहे तो आम खाने को लोग तरस जाएंगे। बागपत में रहौल क्षेत्र में करीब 150 किस्म के 400 एकड़ में आम के बाग हैं। बागान मालिक हबीब चौहान व जुनैद फरीदी ने बताया कि 50 फीसदी से ज्यादा नुकसान हुआ है। यही हाल शामली, बुलंदशहर और मुजफ्फरनगर का है। अमरोहा में करीब 40 फीसदी से ज्यादा नुकसान हुआ है। यूपी मैंगो एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष नदीम सिद्दीकी ने बताया कि दुबई से 250 मीट्रिक टन आम का ऑर्डर मिला है।
कुसमौरा के बाग में एक किसान ने बताया कि किराये पर बाग लेते हैं। इस बार करीब 70 लाख रुपये खर्च किए हैं। अबकी बार लागत निकलनी मुश्किल है। उन्होंने बताया कि प्रति बीमा बाग का किराया 45 से 50 हजार। दवा छिड़काव, मजदूरी, बैग बांधने और तोड़ाई आदि का खर्चा 30 से 35 हजार है। कुल खर्चा करीब 80 हजार लगता है। इस बार लागत निकलना मुश्किल है।
अब गर्मी की जरूरत है तो नमी बनी हुई है
मौसम का बदलाव आम के लिए जहर बन गया है। कुछ ऐसी ही बात आसपास के बागवान समौर सिंह, विपिन शंकर शुक्ला आदि भी बताते हैं। मलिहाबाद में बने औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र के विशेषज्ञ डॉ. सचिन आर्या कहते हैं कि मौसम ने नुकसान किया। पहले भुनगा फिर थ्रीप्स का अटैक रहा। यह सूक्ष्म कीट बऔर (फूल) और नई पत्तियों को नुकसान पहुंचाता है। इसे नियंत्रित करने के लिए इमिडाक्लोप्रिड या फिप्रोनिल का स्प्रे करना होता है। इससे लागत बढ़ गई।
औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र के मुख्य विशेषज्ञ कृष्ण मोहन चौधरी का कहना है कि फल लगने के बाद जितनी लू चलती है, आग के लिए उतना ही अच्छा होता है। कीट और बीमारियां कम लगती हैं। आम उत्पादकों की समस्या को देखते हुए अन्य राज्यों में आम निर्यात का प्रयास शुरू कर दिया गया है। बागों के बीच में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बैगिंग कराई जा रही है।


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