चुनावी मुद्दे साल दर साल


- ललिता जोशी
 लोकतन्त्र का मंदिर और उसके स्वयंभू पुजारी हमारे नेतागण और भक्तगण हो गई जनता । अपने देश में लोकतन्त्र का उत्सव चुनाव तो वर्षपर्यंत चलता ही रहता है । ये ऐसा उत्सव है जहां राजा और रंक दोनों ही एक पंक्ति में खड़े रहकर अपने मत का दान करते हैं । इस उत्सव में जनता जनार्दन की भूमिका बहुत अहम होती है । इनका वोट नेताओं को सत्ता की वैतरणी पार कराता है । इसीलिए चुनावों में सभी दल ऐडी से चोटी तक ज़ोर लगाते हैं । ज़ोर लगता है मुद्दों पर । इतने चुनाव हो चुके हैं अपने देश में । चुनावी मौसम में मुद्दों और बयानों की झमाझम बरसात होती है । मुद्दे तो चुनाव दर चुनाव एक जैसे ही रहते हैं । एक तो गरीब दूसरा घुसपैठ तीसरा धर्म । भारत को स्वतंत्र हुए 78 वर्ष पूरे हो चुके हैं और अब हम स्वतन्त्रता के 79वां वर्ष मना रहे हैं।
हमारे चुनावी मुद्दे लगभग तब से लेकर अब तक एक जैसे ही हैं । एक तोगरीब और गरीबी । बड़े ही आश्चर्य की बात है कि जो भी सरकार सत्ता में आती है,वो गरीबों के उत्थान के लिए जोरों -शोरों से कार्य करती है । गरीबों के लिए राशन ,आवास योजनाएँ ,स्वास्थ्य योजनाएँ और अन्य कल्याणकारी योजनाएँ। ये सब तो चल ही रहा है लेकिन गौरतलब है कि न गरीब कम हुए न गरीबी । लानत है ऐसी योजनाओं पर जो समस्या हल ही नहीं हो रही बल्कि गरीबी विकराल रूप धारण करती जा रही है । गरीबों और गरीबीमें कोई लिंगभेद नहीं है । लिहाजा गरीब चाहे किसी भी लिंग या धर्म के हों उन्हें सभी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा । अपने देश में चुनाव आते ही गरीबों को हीरो और गरीबी उनकी विशेषता बन जाती है । इसीलिए सभी नेता उनके दर पर जाते हैं ताकि उनसे दान मांग सकें । अरे समझे की नहीं दान यानि मतदान । इस दान से उम्मीदवारों को अगर जीत मिल जाए तो कहना ही क्या ! जीतने वाले उम्मीदवारों के पौ बारह हो जाते हैं मगर गरीबों की गरीबी उनके गले में माला बन कर पड़ी रहती है ।
हजारों करोडों रूपये के बजट प्रतिवर्ष इनके उत्थान के लिए खर्च करती है लेकिन वो न जाने किस गर्त में चला जाता है । हम नज़र उठा के देखें तो अपने आस-पास हर चौराहे और लाल -बत्तियों पर भीख मांगते हुए बच्चे और औरतें ,ट्रांसजेंडर भीख मांगते हुए दिख जाएंगे। झुग्गी-झोपड़ी के कलस्टर दिखाई पड़ेंगे । ये हमारे नेताओं की महानता ही है कि उन्हें गरीब दरिद्र नारायण नज़र आता है । आए भी क्यूँ न क्योंकि इसी नारायण के दान(मत) से उन्हें सिंहासन मिलता है ।
प्रत्येक चुनाव में गरीबों और गरीबी को प्राथमिकता दी जाती है । मज़ेदार बात ये है की  गरीब और गरीबी दिनोंदिन सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते ही जा रहे हैं । कई बार तो लगता है कि अपने देश में राजनीतिक दलों के लिए गरीब और गरीबी वरदान हैं । इसबहाने से ये गरीबों के उद्धारक और गरीबी के संहारक की भूमिका में अपनी उपस्थिति को अनवरत ही बनाए रखते हैं । जब तक गरीब और गरीबी रहेगी तब तक राजनीतिक दल अपना साम्राज्य बनाए रखने में कामयाब रहेंगे । गरीब इनकी कामधेनु है जिसे ये चंद रुपयों का चारा डालकर उसकी गरीबी को दुहते हैं ।
अब बारी आई घुसपैठियों के मुद्दे की । अपने देश में न जाने कितनी बड़ी संख्या में सीमा पार से घुसपैठिये घुस जाते हैं और फर्जी दस्तावेजों से नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं । जनता के धन से सभी सुविधाओं का लाभ लेते हैं । कुछ राजनीतिक दल इन्हें संरक्षण देते हैं । इसीलिए ये घुसपैठिये अपनी जनसंख्या में वृद्धि किए जा रहे हैं और अपने आकाओं को चुनाव में अपने मतदान से जीत दिलवाते हैं । ये मूल नागरिकों के हिस्सा खा जाते हैं । इसीलिए इस समस्या का समाधान तो होना ही चाहिए । पता नहीं जब -जब चुनाव में ये मुद्दा उठता तो इसके समर्थन में आने वाले राजनीतिक दल इस मुद्दे को फर्जी बताते हैं । अभी एस आई आर पर एक राज्य की मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार ,सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव के समक्ष विरोध प्रदर्शन किया । ये सभी ने देखा है ।
अब मुद्दा आता है धर्म का । धर्म के नाम पर तो बरसों से युद्ध होते आए हैं । अब सभ्यता से भरपूर विकसितमनुष्यअपने धर्म के लिए कुछ भी कर गुजरता है , बस आम इंसान की इस कमजोरी को राजनीतिक दल  अच्छी तरह से इस्तेमाल कर इसे अपनी ताकत बना लेते हैं और फिर चुनाव में ये उनकी जीत में  काम आता है । सभी अपने – अपने ढंग से धर्म का लाभ उठाना जानते हैं । कभी राम राज्य के सहारे तो कभी मुस्लिम मतदाताओं को उनके धर्म को खतरे में बताकर उनका समर्थन अपने पक्ष में करना । धर्म तो मनुष्य को आपस में प्रेम से रहना और सहिष्णु सिखाता है । आपस में एक दूसरे का सम्मान करना सिखाता है न कि धर्म के नाम पर एक दूसरे की भावना को आहत करना और एक दूसरे का रक्तपात करना ।
अभी मुद्दे खत्म नहीं हुए हैं । एक मुद्दा है जातिगत राजनीति का । जातियाँ का बहुली  भी राजनीतिक दलों का वोट बैंक है । जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति का बाहुल्य होगा वहाँ से उसी जाती का उम्मीदवार चुनाव के क्षेत्र में जीत की सुनिश्चितता के साथ उतारा जाता है । अगर कोई जाति सूचक शब्दों का प्रयोग कर दे तो उसे गिरफ्तार कर सजा दे दी जाती है । बेचारा आम आदमी तो मतदान करके अपना फर्ज पूरा करता है । मगर चुनावी मुद्दे साल दर वही बने रहते हैं और आम आदमी भी वहीं का वहीं रहता है । बस अनियमित बस्ती में रहने वालों के मकान नियमित बस्तियों में आ जाते हैं । बस के लिए किराया फ्री कर दिया जाता है । महिलाओं, बुजुर्गों और किसानों को कुछ धनराशि । साथ ही कुछ स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ दे दिया जाता है । ये सभी कुछ इनके लिए दो बूंद ज़िंदगी का साबित हो जाती है ।


बस चुनावी मुद्दे साल दर साल यही रहते हैं अगर कुछ बदलता है तो वो है शासक दल यानि पुजारी । वैसे तो अगर मरीज की नब्ज अगर डॉक्टर पकड़ ले तो उसका इलाज हो जाता है ऐसे ही राजनीतिक दल अगर मतदाता की नब्ज जान जाए तो जीत पक्की ही होती है ।
बाकी और भी मुद्दे हैं लेकिन इन मुद्दों के आगे सब मुद्दे बौने हो जाते हैं । अभी होने वाले चुनावों में यही  मुद्दे सिर चढ़ कर बोल रहे हैं ।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)

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