बढ़ती किशोर आक्रामकता
राजीव त्यागी
भारतीय किशोरों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति और क्रूर मानसिकता आज गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। जिस उम्र में बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास की नींव रखी जाती है, उसी समय उनमें आक्रामकता और हिंसा का बढ़ना समाज के लिए खतरनाक संकेत है। हाल के वर्षों में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की संख्या और उनकी क्रूरता ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक, पारिवारिक और शैक्षिक मूल्यों के गहरे संकट को दशार्ता है।
दिल्ली के दयालपुर क्षेत्र में मामूली विवाद में हुई एक युवक की निर्मम हत्या, जिसमें किशोरों की संलिप्तता सामने आई, इस विकृति का भयावह उदाहरण है। यह घटना केवल अपराध नहीं, बल्कि संवेदनाओं के क्षरण और नैतिकता के पतन का प्रतीक है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर किशोरों में यह हिंसात्मक प्रवृत्ति पनप क्यों रही है? इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण पारिवारिक संरचना में बदलाव है। पहले संयुक्त परिवारों में बच्चों को संस्कार और अनुशासन का वातावरण मिलता था, जबकि आज एकल परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता के कारण संवाद का अभाव हो गया है।
परिणामस्वरूप किशोर अपनी समस्याओं का समाधान बाहर तलाशते हैं और कई बार गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। दूसरा बड़ा कारण डिजिटल और सोशल मीडिया का अनियंत्रित प्रभाव है। इंटरनेट ने जहां ज्ञान के अवसर बढ़ाए हैं, वहीं हिंसा और अश्लीलता से भरी सामग्री भी सहज उपलब्ध कर दी है। फिल्मों और वेब सीरीज में अपराध को जिस तरह प्रस्तुत किया जाता है, वह किशोरों को प्रभावित करता है और वे उसे रोमांच या साहस के रूप में देखने लगते हैं। शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियां भी इस समस्या को बढ़ा रही हैं।
आज देश में जिस तरह से बच्चों के द्वारा अपराध को अंजाम दिया जाने लगा है वह बच्चों के द्वारा होने वाले अपराध की एक कड़वी वास्तविकता है. वर्तमान समय में देश में बच्चे बहुत से खतरनाक अपराधों में लिप्त पाये जाने लगें हैं जैसे कि चोरी, लूट, झपटमारी, लड़ाई-झगड़े, हत्या, सामूहिक दुष्कर्म आदि. ये माता-पिता के साथ-साथ परिवार, समाज व सरकार के लिए भी एक बहुत ही चिंता का विषय है।

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