राजनीति के चौखट पर नतमस्तक आधुनिक शिक्षा
- प्रो नंदलाल
विद्या ददाति विनयम, विद्या तो विनय सिखाती है और विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन की प्राप्ति होती है और धन से धर्म की उत्पत्ति तथा धर्म करने से सुख मिलता है। पर हो रहा है उल्टा। धन कमा लेने के बाद लोगो में संतोष नहीं है उन्हें या सभी को और धन चाहिए। धर्म तो मरते समय भी कर लेंगे पर धन तो तभी तक कमाया जा सकता है जब तक शरीर में ताकत है। इसलिए सर्वोच्च अदालत में जज रह लेने के बाद भी पैसे की ख्वाइश बनी रहती है और कहीं राज्यपाल तो कहीं राज्यसभा सदस्य बनने की इच्छा बलवती हो उठती है। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, सचिव, मुख्य सचिव रह लेने के बाद राजनीति के चौखट पर नाक रगड़ते भी अधिकारियों को आपने देखा ही होगा। डीजीपी, आईजी, डीआईजी रह लेने के बाद अधिकारियों को चुनाव लड़ते हुए आपने सुना ही होगा। कोई यह तर्क दे सकता है कि ये उच्च पदों से सेवामुक्त हुए लोग चूंकि बुद्धिमानों की श्रेणी में आते हैं और देश को चलाने के लिए बुद्धिमान लोगों की जरूरत होती है इसलिए इनका राजनीति में आना कोई बुरी बात नहीं है। यह तर्क सही है। कोई बुरी बात नहीं है और देश सेवा राजनीति के माध्यम से ही हो सकती है अतः राजनीति के इर्द गिर्द नाचना अवश्यसंभावी है।
अब प्रश्न उठता है कि शिक्षा और उसके माध्यम से प्राप्त उच्च पद और फिर राजनीति में कदम के माध्यम से ही देश की सेवा की जा सकती है या और भी कोई तरीके हो सकते हैं। भारत रत्न नानाजी देशमुख भी राजनीति में थे यह बताने वाली बात नहीं है पर उन्होंने साठ साल के बाद राजनीति से दूर हो जाने की बात कहकर वे राजनीति से दूर होकर समाज सेवा में लग गए और उन्होंने गोंडा और चित्रकूट में विस्मयकारी कार्य कर डाले। आज उनके कार्य विश्व स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे हैं। मैने यहां दो प्रकार के व्यक्तित्व की चर्चा उठाई है।
एक तो वे जो जीवनभर राजनीति में रहे और बाद में समाज कार्य में लग गए और एक वो जो जीवन भर शासकीय उच्च पदों पर नौकरी किए और बाद में राजनीति में घुसने के लिए उद्यत हो गए और घुटने टेके।दोनों तरह के व्यक्तित्व के योगदानों की तुलना की जाय तो यह स्वयं स्पष्ट हो जाएगा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी दिशाहीन रही कि उसने उस व्यक्तित्व का निर्माण नहीं किया जो इतने उच्च पदों पर बैठे रहे लोगों के मन मस्तिष्क को संतोष और नैतिकता के ढांचे में ढालने में असमर्थ रही।
इतने अधिक लोग भ्रष्टाचार में डूबे रहे जिनके यहां सीबीआई, ईडी के छापे पड़ते हैं और करोड़ो करोड़ नगदी सोना, चांदी, प्लॉट, फ्लैट इत्यादि बरामद होते हैं। यह व्यक्ति का दोष नहीं अपितु यह शिक्षा और संस्कार का दोष है जो व्यक्ति के अंदर लालच और मोह उत्पन्न करती है। हम ईश्वर के प्रति ऋणी नहीं होते कि उसने आपको इतने उच्च पदों तक आसीन कराया और शान की जिंदगी बिताई उल्टे हम और की लालसा में राजनीति के इर्द गिर्द उद्यत रहते हैं।
प्रश्न यह है कि आधुनिक शिक्षा क्या हमें मोही, लालची, नफरती विद्वेषी, स्वार्थी और भ्रष्ट आचरण ही सिखाती है या लोगों को लोगो से जोड़ने, परोपकार करने, नैतिक आचरण करने, दूसरों के लिए रास्ता बनाने की भी बात सिखाती है। यदि हमारी शिक्षा में शक्ति होती तो उच्च पदों पर शान की नौकरी कर सेवामुक्त हुए लोगों को समाज को जोड़ने का कार्य करना चाहिए न कि राजनीति में प्रवेश का।क्योंकि राजनीति स्वयं में कोई पवित्र संप्रत्यय नहीं है। यह बात भी सही है कि भारत में कार्यपालिका,और नीति निर्धारण का कार्य सरकारें ही करती हैं और सरकारें राजनीति से ही बनती हैं पर सरकारें देश सेवा के नाम पर जब समाज को विभिन्न आधारों पर बांटने का कार्य करने लगें तो वह लोकहित और राष्ट्र हित में नहीं होता । ऐसी राजनीति को तिलांजलि दे देनी चाहिए।जो राजनीति धन कमाने का जरिया बनती हो उस राजनीति को दूर से ही प्रणाम कर लेना चाहिए।
रही बात समाज की तो समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे। छोटे मोटे स्वार्थ के लिए समाज में विघटन पैदा करना राष्ट्र विकास में बाधा डालता है। हमारी आधुनिक शिक्षा जिसको सीखकर पढ़कर लोग बड़े हो रहे हैं वे जाति और धर्म के नाम पर दूसरे समाज को अपशब्द और भला बुरा बोलते रहते हैं। हमारी भारतीय ज्ञान व्यवस्था में यदि किसी ने कुछ लिख दिया और अब वह दुनिया में नहीं है किसी को कुछ बुरा लगता है तो उस साहित्य को या उस पुस्तक को आप भला बुरा कहो न कि समूचे समाज को। इस विद्वेष की उत्पत्ति के पीछे किसका हाथ है।स्पष्ट रूप से राजनीति का।
तो क्या हमारी शिक्षा का दर्शन इतना कमजोर और खोखला है कि एक प्रोफेसर यह गिनता है कि उत्तर प्रदेश में कितने वर्ष ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे।ऐसी सोच को कौन जन्म दे रहा है। हमारी शिक्षा व्यवस्था।जब हमारे देश में शिक्षा का स्वरूप अलग था तो चिंतक, ऋषि, महात्मा, विद्वान, निपुण और अच्छे शासक पैदा होते थे। चाणक्य, विदुर, शंकराचार्य, जैमिनी, कपिल, सांदीपनी पैदा होते थे जिन्होंने समाज को जोड़ने की शिक्षा दी। एक दो अपवादों को छोड़ दें तो उस शिक्षा और ज्ञान परंपरा से महामानव जन्म लेते थे पर आधुनिक शिक्षा का दर्शन ही विघटनकारी है, जो समाज में हिंसा, नफरत, घृणा, द्वेष, भ्रष्टाचार, घूसखोरी पैदा कर रहा है और उच्च शिक्षित और उच्च पदों पर बैठे लोग इसी ऋणात्मक शिल्गुणों में प्रवेश लेने को आतुर हैं।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)



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