नशे में मरती संवेदना
राजीव त्यागी
बुलंदशहर के खुर्जा में बर्थडे पार्टी में तीन युवकों की हत्या करने वाला बर्थडे ब्वॉय जीतू सैनी मुठभेड़ में ढेर हो गया। एनकाउंटर में एसओजी प्रभारी असलम और एक अन्य सिपाही भी घायल हो गए। यह पूरा घटनाक्रम ही समाज के लिए एक सवाल छोड़ता है।
चिंतन करने की बात ये है कि आखिर जीतू सैनी ने अपनी ही वर्थडे पार्टी में यह वारदात की ही क्यों। सूचना के मुताबिक घटना के वक्त जीतू और उसके साथियों ने जमकर शराब का सेवन किया था और फिर जो हुआ वो सबके सामने है। चिंतन करने की बात यह है कि हमारे समाज में समय-समय पर घटित होने वाली हिंसात्मक और अमानवीय घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की विफलता का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि वे हमारे सामाजिक ढांचे में व्याप्त गहरे अंतर्विरोधों और समस्याओं का भी संकेत देती हैं।
जब किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ क्रूरता की हदें पार कर दी जाती हैं, तो यह केवल एक अपराध नहीं रह जाता, बल्कि हमारे समाज की संवेदनशीलता, नैतिकता और मानवीय मूल्यों पर एक गहरा प्रश्नचिह्न बनकर उभरता है। हमारे समाज में घटने वाली ऐसी घटनाओं के पीछे कई जटिल और परस्पर जुड़े हुए कारण हैं, जिसमें से नशे की बढ़ती प्रवृत्ति एक प्रमुख कारण है। आज नशा केवल व्यक्तिगत आदत या मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक समस्या का रूप ले चुका है। अब नशा केवल शराब, बीड़ी, गुटखा और तंबाकू तक सीमित नहीं है, बल्कि सिंथैटिक ड्रग्स के प्रयोग से परिणाम अत्यंत भयावह होता प्रतीत हो रहा है। ऐसे नशे के बढ़ते प्रभाव ने न केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया है, बल्कि उसके व्यवहार, सोच और सामाजिक संबंधों को भी विकृत कर दिया है।
नशे का यह रूप व्यक्ति के मस्तिष्क को इस कद्र प्रभावित करता है कि उसकी निर्णय क्षमता क्षीण हो जाती है, परिणामस्वरूप उसके भीतर आक्रामकता, असंवेदनशीलता और हिंसात्मक प्रवृत्तियां जन्म लेने लगती हैं। परिवारों में संवाद की कमी, आपसी समझ का अभाव और भावनात्मक दूरी जैसी समस्याएं भी धीरे-धीरे गहराती जा रही हैं। ऐसे में युवा अकेलापन और तनाव महसूस करते हैं, जो उन्हें गलत दिशा में धकेल देता है।
परिवार, जो किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण की पहली पाठशाला होता है, इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आज माता-पिता को अपने बच्चों की केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि उन्हें उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर भी सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। कुछ मामलों में आक्रामकता और असामाजिक व्यवहार को ‘दबंगई’ या ‘मर्दानगी’ के रूप में भी देखा जाता है, जो कि एक खतरनाक मानसिकता को बढ़ावा देता है। यदि समाज समय रहते ऐसे संकेतों को पहचानकर उचित कदम उठाए, तो कई बड़ी घटनाओं को रोका जा सकता है।
साथ ही जब तक हम अपने युवाओं को मानसिक रूप से सशक्त और नैतिक रूप से जागरूक नहीं बनाएंगे, तब तक इस तरह की समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है। अब समय केवल घटनाओं पर दुख व्यक्त करने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सुधार का है।




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