महंगाई और स्थिर वेतन
इलमा अज़ीम
बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की जीवन शैली व थाली पर गहरा प्रभाव डाला है। मौजूदा दौर में मििल ईस्ट जंग के चलते एशिया ही नहीं, बल्कि यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को संकट में डाल दिया है। इसका सीधा असर महंगाई वृद्धि के रूप में सामने आया है। एक ओर ईंधन संकट और उससे बुरी तरह प्रभावित जनजीवन आक्रोश का कारक बना है। इस महंगाई के बीच कामगारों के वेतन सिकुड़ने लगे हैं।
जीवनयापन कठिन होतेे और कोई समाधान न निकलते देख श्रमिकों का आक्रोश सड़क तक पहुंचने लगा है। सोमवार को नोएडा में फैक्ट्रियों के श्रमिकों द्वारा किया गया हिंसक प्रदर्शन इस संकट की परिणति ही है। वहीं दूसरी ओर हरियाणा की औद्योगिक नगरी मानेसर में भी पुलिस व श्रमिकों के बीच हिंसक झड़पों की खबरें आई हैं। ये टकराव भारतीय औद्योगिक तंत्र की विसंगतियों की ही याद दिलाते हैं।
इस तरह के हिंसक संघर्ष हमारी कानून-व्यवस्था की विफलता को भी उजागर करते हैं। वहीं बताते हैं कि श्रमिक वर्ग, उद्योग और राज्य सरकार के बीच कहीं न कहीं संवाद की कमी है। यही वजह है कि वेतन बढ़ाने की मांग के समर्थन में शुरू हुआ मार्च कालांतर आगजनी, तोड़फोड़ व यातायात बाधित करने में तब्दील हो गया। समय रहते अगर इस श्रमिक असंतोष को भांपते हुए बेहतर ढंग से संवाद किया जाता तो शायद टकराव की स्थिति पैदा न होती। दरअसल, सरकारों की तरफ से तो कहा जा रहा है कि देश में ईंधन व गैस आपूर्ति में कोई व्यवधान नहीं है, लेकिन जमाखोरी व प्रशासन की उदासीनता से इसकी कालाबाजारी जारी है।
श्रमिक वर्ग जो छोटे गैस सिलेंडरों से जीवन-यापन करता था, उसमें व्यवधान पैदा हो गया। नियंत्रित गैस आपूर्ति से छोटे गैस सिलेंडर भरने का धंधा ठप हो गया। शायद सरकारों को भी इस बात का अहसास नहीं था कि कितना बड़ा श्रमिक वर्ग छोटे गैस सिलेंडरों को भरने के काले धंधे पर निर्भर है। यही वजह है कि हिमाचल समेत कई राज्यों में खाना पकाने के संकट के चलते श्रमिकों के घर लौटने के मामले प्रकाश में आए हैं। लेकिन इस संकट को शासन-प्रशासन के स्तर पर गंभीरता से नहीं लिया गया। निर्विवाद रूप से बढ़ती महंगाई और स्थिर वेतन के बीच बढ़ती खाई से अशांति की जड़ें गहरी होती जा रही हैं। यह भी हकीकत है कि तात्कालिक उपाय के रूप में बातचीत और शिकायतों का फौरी निवारण कारगर विकल्प नहीं हो सकते। दरअसल, श्रमिकों का उपेक्षित महसूस करना वातावरण को अस्थिर बनाता है।
लेकिन यह एक हकीकत है कि दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तन के लिये विनिर्माण की महत्वाकांक्षाएं स्थिर-प्रेरित कार्यबल के बिना संभव नहीं हैं। औद्योगिक अशांति केवल उत्पादन-निवेश तक ही सीमित नहीं रहती। इससे आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने और निवेशकों का भरोसा कम होने की आशंका भी पैदा होती है। निस्संदेह, आर्थिक प्रगति समावेशी हो। शासन को श्रमिक हितैषी होना चाहिए।





No comments:
Post a Comment