बदल रहा है भारतीय जनमानस का मनोविज्ञान
अत्यंत गंभीर विषय है कि भारतीय जनमानस का मनोविज्ञान बदल रहा है।ममनोविज्ञान कोई शाश्वत मूल्य नहीं है जो बदल नहीं सकता और न ही उसके बदलने से कोई भारी क्षति संभावित है। मनोविज्ञान तो बदलने के लिए ही होता है क्योंकि इसका संबंध हमारे मन, चित्त, बुद्धि और संपूर्ण संज्ञान से है। इन तत्वों में निरंतर परिवर्तन चलते रहते हैं इसलिए मनोविज्ञान भी परिवर्तनशील है। इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि मनोविज्ञान में स्थिरता नहीं होती। यह लंबे समय तक स्थायित्व को भी साथ लेकर चलता है जैसे हिंदू उदारवादी होते हैं, सिक्ख मेहनती होते हैं, ब्राह्मण बुद्धिमान होते हैं इत्यादि। इसमें स्थायित्व है इसका यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि ये परिवर्तनशील नहीं हैं। ये शीलगुण लंबे अंतराल पर बदल भी सकते हैं।
भारतीय जनमानस शांत, स्थिर, उदारवादी सोच वाला रहा है और हमेशा यह कामना भी किया है सर्वे भवन्तु सुखिनाः। वसुधैव कुटुंबकम् की भावना भारतीय जनमानस के रग रग में भरा हुआ है। इतने बड़े देश में जहां विभिन्न प्रकार की भाषाएं, बोलियां, वेशभूषा, खान पान, रीति रिवाज परंपराएं, संस्कृति और प्रकृति है फिर भी हम भारतीय हैं, हिंदुस्तानी हैं, इंडियन हैं। यह इसलिए संभव हुआ है कि हमारी संस्कृति और सभ्यता, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन हमें एक मनोविज्ञान देता है जिससे हम अपना जीवन यापन एक व्यवस्था में कर पाते हैं। इतनी विविधता में भारतीयता की गूंज हमेशा प्रतिध्वनित होती रहती है। यह सहनशीलता और उदारवादी सोच के कारण ही संभव हो सका है। अब भारतीयों का मनोविज्ञान बदलने लगा है।आध्यात्मिक और आंतरिक व्यवस्था में निमग्न भारतीय अपने इस सांस्कृतिक छाया को थोड़ा थोड़ा दरकिनार करने लगे हैं।सरकारें कोशिश कर रही हैं और हिंदुत्व को पुनर्जागृत करने का प्रयास कर रही हैं पर एक बहुत बड़ी आबादी बहुजन और जनजातियों की बौद्धवाद और ईसाईयत की तरफ रुख कर रही हैं। इस पर चिंतन की जरूरत है।
सूचना क्रांति ने सूचनाओं की चौआई बहा रखी है और ग्रहण करने वाले बिना कुछ सोचे आनंदित हो रहे हैं। हमें अपना आध्यात्मिक पक्ष जीवन विकास क्रम में अर्थहीन प्रतीत होने लगा है, वह हमारे विकास मार्ग में बाधक लग रहा है।हमारा पुरुषार्थ वाला पक्ष बेतरतीब लग रहा है। मोक्ष और पुनर्जन्म की बातें डराने के सिवा और कुछ नहीं रह गई हैं। कर्म और भाग्य, प्रारब्ध और संचित कर्म बेमानी हो चले हैं। हम एक नए जीवन दर्शन की तरफ घूमने के प्रयास में हैं। हमें चौकन्ना होना होगा अन्यथा यदि हमारी सांस्कृतिक विरासत कोई और रूप धारण कर लेगी तो हिंदुस्तान पर एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो सकता है और इतिहास चक्र में ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं।इसलिए सतर्क होने की जरूरत है कि भारतीय जनमानस का मनोविज्ञान एक नया मोड़ ले रहा है। भारतीय समाज का ताना बाना जो घनीभूत होकर भारतीय के रूप में, हिंदुस्तानी के रूप में सदियों से चला आ रहा है अचानक वह झीना हो चला है। भारतीय विविधता के तार आपस में टकराने लगे हैं, वर्गयुक्त समाज एक दूसरे को कोस रहा है,अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहा है और हम उस पर राजनीति की चौसर बिछा रहे हैं। यह चौसर जब एक किसी पक्ष के लिए नुकसानदायक होगा तो दूसरा वर्ग उखड़ेगा और उसकी भेंट चढ़ेगा।
भारतीय युवा समाज समाज में उदारवाद का पक्षधर बनता जा रहा है।वह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में अपने लिए जकड़न महसूस कर रहा है। उसे स्वतंत्रता चाहिए न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर अपितु उसे अपने घर परिवार में भी आजादी चाहिए। उसे निर्णय लेने का अधिकार चाहिए।यदि उसके स्वतंत्र निर्णय से घर परिवार समुदाय के लोग सहमत हैं तब तो ठीक है अगर असहमत होते हैं तो अन्य लोगों को अपनी चाहतों की कुर्बानी देनी ही होगी अन्यथा अपनी अपनी डफली अपना अपना राग।उसे भौतिकवाद पसंद है उसे पूंजीवाद पसंद है।इसमें उसे स्वतंत्रता दिखती है।उसमें उसे खुलापन लगता है।आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रास्ते में ढेर सारे बंधन दिखते हैं।आज के युवा खुली मानसिकता में जीना चाहते हैं।जो हमें सतही तौर पर सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियां दिखाई पड़ती हैं वे बहुत अस्थाई हैं और अधिरोपित हैं।हकीकत यह है कि हम जीवन शैली में बदलाव का समर्थन कर रहे हैं। हमें खाने में विदेशी भोजन पसंद आ रहे हैं, पहनावे में विदेशी परिधान पसंद आ रहे हैं, बाल कटवाने में विदेशी मॉडल पसंद आ रहे हैं तो फैशन में विदेशी फैशन अच्छे लग रहे हैं। हमें भारतीय सामग्री अच्छी नहीं लग रही क्योंकि विदेशी वस्तुओं का प्रयोग हमे विकासवादी बना रहा है और भारतीय वस्तुओं का प्रयोग करने वाले लोग पिछड़ते जा रहे हैं। विकास के दौड़ में शामिल होना है तो हमें विदेशी दिखना भी चाहिए। इस सोच को लेकर आज की नई पीढ़ी आगे बढ़ रही है।
इसलिए जहां भारतीय जन मानस का मनोविज्ञान सहनशीलता, सहिष्णुता, शांति, परोपकार और सद्भाव का था वह अब तार्किक, वैश्विक संस्कृति की पोषक, खुलापन, प्रतिक्रियावादी और थोड़ी उग्र मानसिकता का होता जा रहा है। असहनशीलता बढ़ती जा रही है और प्रक्षेपण का भाव जोर पकड़ रहा है।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)



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