ईरान युद्ध और खाड़ी देश
 इलमा अज़ीम 

पश्चिम एशिया में भड़की जंग ने दुनिया को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां हर अगला दिन एक नए खतरे का संकेत दे रहा है। यह सिर्फ दो देशों के बीच का टकराव नहीं रहा, बल्कि पूरी वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था को सीधे निशाने पर ले आया है। इससे खाड़ी देशों की स्थिति सबसे ज्यादा नाजुक हो गई है। एक तरफ वह ईरान की कार्रवाई से नाराज हैं, दूसरी तरफ उन्हें डर है कि अगर वह सीधे युद्ध में उतर गए तो अमेरिका कभी भी पीछे हट सकता है और वह अकेले पड़ जाएंगे।
 हालांकि सऊदी अरब ने चेतावनी दी है कि जरूरत पड़ी तो वह सैन्य कार्रवाई करेगा। उधर, कतर ने ईरानी अधिकारियों को देश छोड़ने का आदेश दे दिया है। लेकिन इन सबके बीच एक अनकहा डर साफ दिखता है, यानि कोई भी देश पूरी तरह इस आग में कूदने को तैयार नहीं है। सबसे खतरनाक बात यह है कि अब ऊर्जा खुद एक हथियार बन चुकी है। गैस संयंत्र, तेल क्षेत्र और बंदरगाह अब सैन्य निशाने हैं। 

अगर यह सिलसिला जारी रहा तो दुनिया को एक ऐसे ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है जो पहले कभी नहीं देखा गया। यह संकट सिर्फ पेट्रोल या गैस की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर हर घर, हर उद्योग और हर देश पर पड़ेगा। महंगाई बढ़ेगी, आपूर्ति टूटेगी और अर्थव्यवस्थाएं हिल जाएंगी। अब सवाल यही है कि क्या इस आग को बुझाने का कोई रास्ता बचा है।

 सच यह है कि इस समय केवल अमेरिका ही ऐसा देश है जिसके पास दोनों पक्षों को रोकने की ताकत है। लेकिन क्या ट्रंप ऐसा करना चाहते हैं, यह सबसे बड़ा सवाल है। अगर अमेरिका बिना शर्त इजरायल का साथ देता रहा तो यह संघर्ष पूरी तरह ऊर्जा युद्ध में बदल जाएगा। लेकिन अगर वह दूरी बनाकर किसी समझौते की राह निकालता है, तभी हालात संभल सकते हैं।



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