मात्र संवाद नहीं हिंदी है रोज़गार की भाषा: शिखा वार्ष्णेय (लंदन)

हिंदी है हिंदुस्तान का भविष्य:  अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकार शिखा वार्ष्णेय 

मेरठ। मेरठ कॉलेज के डॉ. रामकुमार गुप्ता सभागार में  “वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिन्दी भाषा एवं साहित्य की वर्तमान स्थिति” विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन साहित्य एवं सांस्कृतिक परिषद द्वारा किया गया, जिसकी संयोजिका प्रो. रेखा राणा तथा सह-संयोजक प्रो. वाचस्पति मिश्रा रहे।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार एवं प्रतिष्ठित विदुषी शिखा वार्ष्णेय ने हिन्दी भाषा की समकालीन भूमिका, वैश्विक स्तर पर उसकी प्रासंगिकता तथा साहित्यिक विकास के विविध आयामों पर सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि हिन्दी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा की सशक्त वाहक है। उन्होंने मातृभाषा में ज्ञानार्जन को सहज और प्रभावी बताते हुए हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया।

अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में यात्रा के दौरान हिन्दी समाचार पत्रों की उपलब्धता सीमित है, जो हिन्दी की उपेक्षा को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि लंदन में रहकर वे हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार हेतु निरंतर प्रयासरत हैं तथा भारतीय साहित्यकारों के सम्मेलन भी आयोजित करती हैं। उन्होंने हिन्दी बोलने में हीन भावना को दूर करने के लिए पहल करने, हिन्दी को रोजगार की भाषा बनाने के लिए निर्भीक होकर प्रयोग बढ़ाने तथा हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ाने हेतु अनुवाद और भाषाई समावेशन को आवश्यक बताया।

कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने सक्रिय रूप से प्रश्न पूछे, जिनका वक्ता ने समाधान प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में प्रो. ऊषा किरण ने अपनी काव्य प्रस्तुति देकर वातावरण को साहित्यिक रस से सराबोर कर दिया।कार्यक्रम में प्रो. अर्चना सिंह (संयोजक, आईक्यूएसी), डॉ. अनिल कुमार (मुख्य नियंता), प्रो. मनोज सिवाच, प्रो. सांत्वना शर्मा, प्रो. मोनिका भटनागर, प्रो. राम यज्ञ मौर्य, प्रो. अमृत लाल, प्रो. अनीता मोरल, डॉ. अशोक शर्मा, डॉ. मुकेश सेमवाल, डॉ. दिनेश कुमार, जॉनी कुमार, अल्केश कुमार, श्वेता सहित अनेक शिक्षक एवं शोधार्थी उपस्थित रहे। धन्यवाद प्रस्ताव डॉ. मुकेश सेमवाल ने प्रस्तुत किया।

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