हिमालयी राज्यों में आपदाएं


 इलमा अज‍़ीम 
इस वर्ष की भारी वर्षा ने उत्तराखंड में विनाश की झलक दिखा दी, जबकि हिमाचल प्रदेश भी उसी संकट की छाया में है। बादल फटना, भूस्खलन, ग्लेशियरों का पिघलना और अवैज्ञानिक निर्माण ने इन हिमालयी राज्यों को त्रासदी की ओर धकेल दिया है। हिमालयी राज्यों की सबसे बड़ी त्रासदी का कारण अनियंत्रित निर्माण है।
 उत्तराखंड में 4,000 से अधिक होटल और गेस्टहाउस नदियों के प्राकृतिक बाढ़ मार्गों पर बने हैं, जो बाढ़ के समय सबसे पहले ध्वस्त होते हैं और तबाही को कई गुना बढ़ा देते हैं। केवल ‘नो कंस्ट्रक्शन ज़ोन’ घोषित कर इन ढांचों को चरणबद्ध हटाना ही हजारों जीवन बचा सकता है। 


वहीं चारधाम यात्रा में हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, जबकि हिमाचल के प्रमुख मंदिरों में सवा करोड़ से अधिक श्रद्धालु आते हैं। तंग घाटियां और नाज़ुक रास्ते इस भारी दबाव को सहन नहीं कर पाते हैं। इसके परिणामस्वरूप जाम, कचरे के ढेर और बरसात के दौरान गंभीर दुर्घटनाएं होती हैं। इसलिए डिजिटल परमिट जारी कर दैनिक श्रद्धालुओं की संख्या को सीमित कर देना अनिवार्य है। इस समय उत्तराखंड में 150 से अधिक और हिमाचल में 170 से अधिक बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं मंजूर की गई हैं, जिनमें विस्फोट और सुरंग बनाने के कारण पहाड़ अस्थिर हो रहे हैं। 
अक्सर देखा गया है कि अधिकांश निर्णय राजधानी में लिए जाते हैं, जिनका जमीनी स्तर पर कोई अनुभव नहीं होता। हाल ही में अगस्त में उत्तरकाशी के धराली में बादल फटने से क्षीर गंगा पथरीली सैलाब बनकर उमड़ी और घर, होटल तथा सेना के कैंप को बहा ले गई। हर्षिल में पुल ढह गए, बाजार बह गए और बैरक डूब गए। सड़कें बंद हो गईं, हेलिकॉप्टर उड़ान भरने में असमर्थ रहे और लोग पानी में अपने परिजनों को खोजते रहे। 



उत्तराखंड में करीब 150 से अधिक हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के लिए पहाड़ों को तोड़ा जाना, नदियों का मार्ग बदलना, सड़कों का चौड़ीकरण और अनियंत्रित होटल निर्माण ने पहाड़ों को अस्थिर बना दिया है। हिमाचल की बात करें तो इस बरसात में 574 सड़कें अवरुद्ध हुईं, 369 पेयजल योजनाएं ठप रहीं और 812 ट्रांसफार्मर नष्ट हो गए। 400 से अधिक जानें गईं और रुपये 4,300 करोड़ से ज़्यादा का नुकसान हुआ।

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