खुशबुएं खुद बता देती हैं, वो आता है, आने से मौसम खुशनुमा हो जाता है। जिंदगी दर्द के घेरे से निकल जाती है, प्यार से वह जब सर मेरा दबाता है। आंखों की चमक दिल में उतर जाती है, जब मुझे देखकर वो झूम के मुस्काता है।
हर लफ्ज से लगती, चोट भी दिल में, मेरी कविता का, दर्द से ऐसा नाता है। हुजूम यारों का यह साफ बताता है, तेरा सलूक-ए-संजीव बहुत भाता है। -------- - संजीव ठाकुर, रायपुर (छत्तीसगढ़)।
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