जीवन से हारना नहीं, एक दरवाजा अभी खुला है


- संध्या अग्रवाल

“माना सियाह रात तेरे अंधेरे घने हैं, मगर मेरे हौसलों के दीपक जले हैं।”
जीवन में ऐसा मोड़ आ सकता है जब लगे कि अब कुछ बचा नहीं। कोशिशें नाकाम, रिश्ते साथ छोड़ते हुए, भविष्य धुंधला। पर अक्सर रास्ते खत्म नहीं होते, हमारी नजर में एक ही रास्ता बचता है, बाकी दिखना बंद हो जाते हैं।

10 सितंबर विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस है। इस दिन आंकड़ों से ज्यादा जरूरी उन चेहरों को देखना है जो पास रहते हुए भी भीतर से अकेले हैं। आत्महत्या अचानक फैसला लगती है, पर उसके पीछे लंबे समय की निराशा, असहायता और थकान जमा होती है।

आज परेशानी बताने से आसान छिपाना हो गया है। दुखी हैं तो भी मुस्कुराइए, असफल हैं तो भी सामान्य दिखिए। बच्चे से हर परीक्षा में अव्वल आने की, युवा से हर हाल में सफल होने की उम्मीद है। हर किसी से मजबूत बने रहने की अपेक्षा है, पर कमजोर पड़ने की इजाजत किसी को नहीं। यहीं से एक खतरनाक चुप्पी जन्म लेती है।

कई बार व्यक्ति को समाधान से पहले एक ऐसे इंसान की जरूरत होती है जिससे वह कह सके - “मैं ठीक नहीं हूं।” पर हम सुनने से पहले सलाह देने लगते हैं - “इतना मत सोचो”, “फिर कोशिश कर लेना”। नीयत बुरी नहीं, पर ये वाक्य उसकी पीड़ा को अनसुना कर देते हैं।

किसी की जिंदगी बचाने के लिए बड़े संसाधन नहीं चाहिए। कभी-कभी बस पास बैठना, बिना टोके सुनना और कहना काफी है - “तुम अकेले नहीं हो, मैं साथ हूं।” यह समस्या हल नहीं करता, पर उस क्षण अकेलेपन से बाहर निकाल देता है।

जिंदगी की कीमत उपलब्धियों से तय नहीं होती। एक परीक्षा, नौकरी छूटना, कारोबार में नुकसान या रिश्ते का टूटना जीवन का अंत नहीं। हम एक घटना को पूरी जिंदगी का फैसला बना देते हैं, जबकि समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं।

युवाओं पर आज तुलना का दबाव बहुत है। सोशल मीडिया पर सबकी जिंदगी सफल और सुंदर दिखती है। अपनी असली जिंदगी की तुलना दूसरों की चुनी हुई तस्वीरों से कर वे खुद को पीछे समझने लगते हैं। उन्हें समझाना होगा कि जिंदगी कोई दौड़ नहीं।

रोकथाम संकट के क्षण से बहुत पहले शुरू होती है। उस घर से जहां बच्चे को बात कहने की आजादी हो। उस परिवार से जहां असफलता पर अपमान नहीं, संवाद हो। उस स्कूल से जहां अंक से ज्यादा भावनात्मक स्थिति को महत्व मिले।

और जब स्थिति संभल न रही हो, तो विशेषज्ञ सहायता लेने में देर न करें। जैसे बुखार को केवल इच्छाशक्ति से ठीक नहीं किया जा सकता, वैसे ही गहरी मानसिक परेशानी को “मजबूत बनो” कहकर दूर नहीं किया जा सकता। मदद लेना कमजोरी नहीं, जिम्मेदारी है। यह दिवस केवल मरने से रोकने की नहीं, जीने की परिस्थितियां बनाने की बात करता है। हमें ऐसा समाज चाहिए जहां परेशानी साझा की जा सके, मदद मांगना शर्म न हो।

यदि कोई लगातार निराश दिखे, लोगों से दूर होने लगे, बहुत नकारात्मक बातें करे तो उसे गंभीरता से लें। संपर्क बनाए रखें, अकेला न छोड़ें और जरूरत पर किसी भरोसेमंद परिजन या विशेषज्ञ तक पहुंचाएं। किसी कठिन रात में अपनी पूरी जिंदगी का फैसला मत कीजिए। थोड़ा ठहरिए, किसी को फोन कीजिए, बात कहिए। हो सकता है जिसे आप आखिरी दरवाजा समझ रहे हैं, उसके बाहर कोई दूसरा रास्ता आपका इंतजार कर रहा हो।

अंधेरे में भी उम्मीद की एक लौ बची रहती है, और कभी-कभी किसी की जिंदगी बचाने के लिए बस इतना ही काफी होता है कि कोई उस लौ को बुझने न दे।
(स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार)

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