स्वास्थ्य सुविधाएँ हों सक्षम
राजीव त्यागी
एक स्वस्थ समाज ही समृद्ध राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। यह बातें अक्सर सुनी जाती हैं। इस दिशा में केंद्र के साथ ही राज्य सरकारें भी अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा भी करती रही हैं। लेकिन गरीबों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं काफी बेहतर नहीं मानी जा सकती। पैसों के अभाव में कई मरीज असमय में ही दम तोड़ देते हैं।
लेकिन विडंबना ये है कि देश की राजनीतिक दलों के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है। हालांकि नए बने अस्पतालों में सुविधा तो काफी अच्छी है, लेकिन उनका लाभ गरीब जनता नहीं उठा पा रही है। अगर हम एनसीआर के शहरों में बने बड़े अस्पतालों को देखें तो आधुनिकीकरण के साथ इस क्षेत्र की चिकित्सा सुविधाओं को विश्व पटल पर भी ला दिया है, इससे एनसीआर मेडिकल पर्यटन केंद्र के रूप में भी उभरा है, लेकिन एक बड़ी आबादी ऐसी भी है, जो इन महंगे अस्पतालों में इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है।
ऐसे में, एनसीआर के लोगों को घर के नजदीक किफायती, सुलभ और वेटिग रहित विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाओं की आकांक्षा है। ताकि अस्पतालों में बेड, जांच सुविधाओं, आइसीयू, आक्सीजन और डाक्टरों की कमी से किसी की जान न जाए। यह विडंबना ही है कि देश में कभी भी सत्ताधीशों की प्राथमिकता सरकारी चिकित्सा-तंत्र को सक्षम बनाने की नहीं रही है। किसी भी चुनाव में स्वास्थ्य सुविधाओं को समृद्ध बनाना राजनीतिक दलों के एजेंडे में शामिल नहीं रहा। जनता भी हर आम परिवार से जुड़े सेहत के मुद्दे को जोर-शोर से उठाने में चूकती रही है। यही वजह है कि आज भी कुल मिलाकर देश के करोड़ों लोगों के लिये सस्ती व पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंच से बाहर हैं। अपने परिजनों के गंभीर रोगों के उपचार के लिये क्षमता से अधिक पैसा जुटाने के फेर में हजारों परिवार हर साल गरीबी की दलदल में धंस जाते हैं। यह गंभीर स्थिति सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में हेल्थकेयर पर बनी संसदीय समिति की हालिया रिपोर्ट साफ तौर पर दर्शाती है।
विडंबना यह है कि सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं का अभाव लगातार बना रहता है। वहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी मरीज महसूस करते हैं। सरकारी अस्पताल की सुविधाओं में बेड, उपकरण, दवाइयां और कुशल स्टाफ की कमी देखी जाती है। मरीज को भरोसा नहीं होता है कि उसे जरूरी इलाज सरकारी अस्पताल में मिल भी पायेगा। एक संकट यह भी है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों का दबाव बहुत ज्यादा होता है।
उसके मुकाबले चिकित्सक उपलब्ध नहीं होते हैं। वहीं दूसरी ओर निजी अस्पतालों में चिकित्सकों की अच्छी आय और निजी प्रैक्टिस का सम्मोहन भी योग्य डाक्टरों को सरकारी अस्पतालों से विमुख बनाता है। यही वजह है कि पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में मरीजों को निजी अस्पतालों में इलाज कराने के लिये बाध्य होना पड़ता है। दरअसल, उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता, अब चाहे उनकी पैसा देने की क्षमता हो या न हो। लोगों की चिकित्सा इमरजेंसी की चिंता की वजह से स्वास्थ्य बीमा का बड़ा कारोबार देश में फल-फूल रहा है।
जिसमें मरीजों को कम व बीमा कंपनियों और निजी अस्पतालों को ज्यादा मुनाफा हो रहा है। यही वजह है कि आज हेल्थकेयर सिस्टम में इलाज की सुविधा परिवार की आमदनी पर बहुत ज्यादा निर्भर हो जाती है। शासन-प्रशासन की प्राथमिकता सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की होनी चाहिए।





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