इंटरनेट से बढ़ती थकान
इलमा अज‍़ीम 
आज का युग तकनीक का युग है और आज के इस तकनीक और डिजिटल युग में हर किसी में डिजिटल थकान समस्या बनती जा रही है। दिनभर या यूं कहें कि लगातार स्क्रीन पर काम करना, बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग, ऑनलाइन बैठकों और एआई आधारित टूल्स पर बढ़ती निर्भरता के कारण लोगों में  मानसिक थकान, एकाग्रता की कमी, आंखों में तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। 

कहना ग़लत नहीं होगा कि  मोबाइल या लैपटॉप पर बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा तैयार की जा रही सामग्री, स्क्रीन पर लगातार काम करने की आदत और विभिन्न एआई टूल्स के बढ़ते उपयोग के कारण आज लोगों में मानसिक और डिजिटल थकान तेजी से बढ़ रही है। विडंबना यह है कि जिन तकनीकों और टूल्स को हमारी उत्पादकता बढ़ाने के लिए बनाया गया था, वे ही अब एकाग्रता में कमी, तनाव और ‘बर्नआउट’ का मुख्य कारण बन रहे हैं। 
ऑनलाइन लेक्चर, वर्चुअल मीटिंग्स,  इंटरनेट पर उपलब्ध असीमित जानकारियों, रील्स और शॉर्ट वीडियोज ने लोगों को इस कदर बांध लिया है कि किताब पढ़ते समय भी ध्यान बार-बार मोबाइल फोन की ओर चला जाता है, जिसका सीधा असर हमारी स्मरण शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता पर भी पड़ रहा है। लगातार डिजिटल माध्यमों के संपर्क में रहने और एआई-आधारित टूल्स से मिलने वाले अलर्ट्स, रिमाइंडर्स व परफॉर्मेंस रिपोर्ट्स के कारण आज मानसिक बोझ बढ़ रहा है।


 वास्तव में, आज चिंता का विषय यह नहीं है कि एआई मानव रचनात्मकता का स्थान ले लेगा, बल्कि यह है कि उस पर अत्यधिक निर्भरता हमारी जिज्ञासा और स्वतंत्र सोच को सीमित कर देगी। इसलिए एआई का उपयोग केवल एक सहायक उपकरण के रूप में होना चाहिए। इनका अनियंत्रित उपयोग मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। भारत के तेजी से बढ़ते डिजिटल समाज में ‘डिजिटल वेलबीइंग’ (डिजिटल कल्याण) को प्राथमिकता देना अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गया है। 

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