पर्यावरण अनुकूल बने शहरी ढांचा
राजीव त्यागी
आईसीएमआर और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें सचेत कर रही हैं कि अत्यधिक गर्मी और लगातार अधूरी नींद इंसानी शरीर के भीतर तापमान नियंत्रित करने की क्षमता को नष्ट कर देती है। जब लगातार कई दिनों तक इंसान की नींद पूरी नहीं होती, तो शरीर में तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन ‘कोर्टिसोल’ अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगता है।
यही कारण है कि लोग ‘एक्यूट’ यानी गंभीर और अचानक उभरने वाली बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। बड़े शहरों के सरकारी अस्पतालों की आपातकालीन ओपीडी के आंकड़े बताते हैं कि मई-जून के महीनों में हीट स्ट्रोक, अचानक ब्लड प्रेशर बढ़ना, ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर डिहाइड्रेशन और किडनी फेलियर के मामलों में एक-तिहाई से ज्यादा की वृद्धि देखी जा रही है। जब पानी का अभाव और अगले दिन बिना सोए दफ्तर या काम पर जुटने की चिंता जुड़ती है, तो इंसान अंदर से पूरी तरह टूट जाता है।
संकट का सबसे भयावह और मूक पहलू महानगरों में मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या है। गर्मी और बिजली संकट को अक्सर हम केवल एक भौतिक या प्रशासनिक समस्या मानते हैं, लेकिन यह सीधे तौर पर हमारी मानसिक सुदृढ़ता पर हमला कर रहा है। लगातार अनिद्रा और शारीरिक कष्ट के कारण लोग गंभीर चिड़चिड़ेपन, घबराहट और क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम का शिकार हो रहे हैं। अत्यधिक गर्मी से उसकी मानसिक सहनशीलता समाप्त हो जाती है। महानगरों में घरेलू हिंसा, सड़कों पर मामूली बात पर होने वाली ‘रोड रेज’ की हिंसक घटनाएं और दफ्तरों में कर्मचारियों के बीच बढ़ते टकराव के पीछे इस ‘थर्मल स्ट्रेस’ का बहुत बड़ा हाथ है।
मनोचिकित्सकों के अनुसार, इन दिनों ओपीडी में आने वाले हर पांचवें मरीज में अनिद्रा और गर्मी जनित मानसिक तनाव मुख्य कारण बनकर उभर रहा है। यह स्थिति हमारी नीतिगत विफलताओं का आईना है। गर्मियों के दिनों में महानगरों के उपनगरों और रिहायशी सोसायटियों में हाहाकार मचा रहता है। ट्रांसफार्मर फुंकने और केबल जलने की घटनाएं आम हैं क्योंकि बिजली के बुनियादी ढांचे पर क्षमता से अधिक लोड है।
हर कोई अपनी जान बचाने के लिए एसी और कूलर चलाने को मजबूर है, लेकिन हमारा वितरण ग्रिड इस मांग को संभालने में सक्षम नहीं है। यदि हमें अपने शहरों को बीमारों का घर बनने से रोकना है, तो पारंपरिक सोच से हटकर नए और साहसिक कदम उठाने होंगे। इसके साथ ही, शहरी नियोजन में ‘व्हाइट रूफिंग’ को बढ़ावा देना होगा और बिजली वितरण प्रणाली को सौर ऊर्जा के ग्रिड से जोड़कर मजबूत करना होगा ताकि ग्रिड फेल होने की नौबत न आए। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में शहरों के बुनियादी ढांचे को पर्यावरण के अनुकूल और मानवीय बनाना होगा।





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