यूपी कैबिनेट विस्तार
बड़े इतिहास वाले गुर्जर समाज को मिला कम प्रभाव वाला विभाग
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गुर्जर मतदाताओं में सुगबुगाहट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बड़ी राजनीतिक ताकत रखने वाले गुर्जर समाज को लेकर प्रदेश के सियासी गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है। उत्तर प्रदेश सरकार के हालिया मंत्रिमंडल विस्तार के बाद हुए विभागों के बंटवारे में गुर्जर समाज के इकलौते चेहरे डॉ. सोमेंद्र तोमर का कद घटाए जाने के बाद पूरे समाज में अंदरखाने रोष पनप रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों और समाज के बुद्धिजीवियों के बीच यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है कि जिस समाज का उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐतिहासिक रसूख रहा है, उसे केवल एक स्वतंत्र प्रभार मंत्री पद देकर और वह भी बेहद कम प्रभाव वाला विभाग सौंपकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) क्या संदेश देना चाहती है ?
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल में मेरठ दक्षिण सीट से लगातार दूसरी बार विधायक बने डॉ. सोमेंद्र तोमर अकेले पूरे गुर्जर समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। 10 मई 2026 तक डॉ. सोमेंद्र तोमर सरकार में ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत विभाग के राज्यमंत्री के तौर पर तैनात थे। हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें राज्यमंत्री से प्रमोट करके राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तो बना दिया गया, लेकिन विभागों के बंटवारे में उनसे भारी-भरकम ऊर्जा विभाग छीन लिया गया। डॉ. सोमेंद्र तोमर को राजनैतिक पेंशन, सैनिक कल्याण तथा प्रांतीय रक्षक दल (PRD) जैसा गैर-पारंपरिक और कम प्रभाव वाला विभाग सौंपा गया है। एक तरफ स्वतंत्र प्रभार का पद मिलना यानी केवल नाम का प्रमोशन और दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर कम महत्व का विभाग मिलना; भाजपा के इस फैसले से गुर्जर समाज के लोग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।यूपी में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को खत्म, पंचायतों के लिए प्रशासक नियुक्ति की तैयारी ये भी पढ़ें यूपी में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को खत्म, पंचायतों के लिए प्रशासक नियुक्ति की तैयारी
गौरवशाली इतिहास के सामने बेहद बौना प्रतिनिधित्व
उत्तर प्रदेश की सियासत में गुर्जर समाज का इतिहास बेहद रसूखदार और कद्दावर रहा है। सूबे की राजनीति में इसी समाज से रामचंद्र विकल और नारायण सिंह जैसे दिग्गज नेता उपमुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे हैं। इसके अलावा चौधरी यशपाल सिंह, बाबू हुकुम सिंह, रामशरण दास, जगबीर सिंह गुर्जर और वेदराम भाटी जैसे नेताओं ने प्रदेश सरकार में कई बार कैबिनेट मंत्री के रूप में बेहद शक्तिशाली और बड़े विभागों को संभाला है। ऐसे गौरवशाली और मजबूत इतिहास वाले समाज को वर्तमान सरकार में कैबिनेट तो दूर, सिर्फ एक स्वतंत्र प्रभार का मंत्री पद मिलना और उसमें भी महत्वहीन विभाग सौंपे जाने से समाज के भीतर गहरा असंतोष देखा जा रहा है।
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पश्चिमी यूपी की 70 सीटों पर सीधा असर, बढ़ सकती है भाजपा की मुश्किलें
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में गुर्जर मतदाताओं को बेहद निर्णायक माना जाता है। इस क्षेत्र में गुर्जर वोटर भाजपा के सबसे मजबूत और पारंपरिक कोर वोटर के रूप में देखे जाते रहे हैं, लेकिन प्रतिनिधित्व कम होने से अब अन्य विपक्षी दल भी इस नाराजगी का फायदा उठाकर उन्हें लुभाने के प्रयास तेज कर सकते हैं।
वोट बैंक का गणित
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों और सीटों पर गुर्जर मतदाताओं की संख्या 10% से अधिक है, जबकि कुछ खास क्षेत्रों में यह प्रभाव 15% से 18% तक पहुंच जाता है।
70 से अधिक सीटों पर दबदबा
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से लगभग 70 सीटों पर गुर्जर समुदाय की मजबूत उपस्थिति मानी जाती है।
पश्चिम के जिलों में गहरा प्रभाव
पश्चिमी यूपी की विधानसभा सीटों पर गुर्जर वोटर काफी मजबूत स्थिति में हैं। विशेष रूप से सहारनपुर, नोएडा, गाजियाबाद, बागपत, मेरठ, कैराना और बुलंदशहर जैसे जिलों में इनका गहरा राजनीतिक प्रभाव है, जो किसी भी दल का खेल बनाने या बिगाड़ने का दम रखता है।
छात्र राजनीति से मुख्यधारा की सियासत तक का सफर
मूल रूप से बागपत के खैली गांव के रहने वाले और वर्तमान में मेरठ दक्षिण से विधायक डॉ. सोमेंद्र तोमर ने अपनी राजनीति की शुरुआत एक छात्र नेता के रूप में की थी। फिजिक्स में पीएचडी की डिग्री धारक डॉ. तोमर वर्ष 2003 में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष पद पर ऐतिहासिक जीत दर्ज कर मुख्यधारा की राजनीति में आए थे। 2017 और 2022 में लगातार दो बार मेरठ दक्षिण से चुनाव जीतने वाले इस युवा चेहरे को समाज के बड़े प्रतिनिधि के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन विभाग आवंटन के बाद अब पश्चिमी यूपी के गुर्जर बाहुल्य क्षेत्रों में भाजपा की इस रणनीति को लेकर तरह-तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।


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