जैकेट तो जैकेट है इसमें लाइफ कहाँ ?
- ललिता जोशी
ऐसा प्रतीत होता मध्यप्रदेश हादसों का प्रदेश बनता जा रहा है कभी विषाक्त पानी पीने के कारण लोगों और बच्चों की मृत्यु हो गई । विषाक्त पानी के कारण ये हादसा पहली बार नहीं हुआ था । नगर पालिका को बार बार गुहार लगाने के बाद भी अधिकारियों ने एक न सुनी और ऐसा हादसा दोबारा हुआ । इसे मीडिया और समाचार पत्रों में व्यापक कवरेज मिली और नेताओं की गलतबयानी पर देशव्यापी आक्रोश व्यक्त किया गया और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई भी की गई । अभी एक मामला शांत हुआ नहीं की दूसरा मामला उठ खड़ा हुआ । एक बार फिर प्रशासन की नकामयाबी ने नागरिकों की जान ले ली ।
हाल ही में जबलपुर में नर्मदा नदी पर बने बरगी डैम में मौसम विभाग के चेतावनी देने के बावजूद क्रूज ने यात्रियों को अपनी क्रूज़ में बैठाया और उन्हें ले कर चल पड़े ।चेतावनी सुनी नहीं सुरक्षा के मापदंड भी नहीं अपनाए । तेज हवाओं के कारण क्रूज़ में पानी भर गया तो लोगों को अपनी जान पर आफत आती हुई दिखाई दी तो जैकेट को चीख पुकार मची लेकिन ये जैकेट तो मानो स्ट्रॉंग रूम में रखे हों । अफरा -तफरी में जैकेट दी गईं लेकिन वो न तो सवारियों को पहननी आई न ही इनकी गुणवत्ता अच्छी थी । क्या ये जैकेटें लाइफ जैकेट कहलाने के लायक थीं । उस पर विडम्बना देखिये की मुनाफा कमाने के लिए तो क्रूज कंपनी । इन कंपनी वालों ने अपनी जान तो बचा ली लेकिन जिनके जरिये ये मुनाफा कमाते हैं , उन्हीं को बलि का बकरा बना दिया । लोगों को डूबने के लिए छोड़ दिया । इनका कसूर क्या था ? उनका कसूर ये था कि उन्होनें कंपनी पर भरोसा किया कि अगर कोई हादसा होगा तो क्रूज कंपनी वाले उन्हें संभाल लेंगे ।
कंपनी ने संभाला अपना मुनाफा और मौत के मुंह में धक्का मिला पर्यटकों को । इतने हादसे होते हैं लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती है । वर्षों से लापरवाही का ढर्रा चला आ रहा है । कभी प्रशासन की लापरवाही से पुल ढहे और कभी गड्ढों में ,कभी खुले गट्टर में लोग काल के गाल में । किसी के घर के चिराग बुझ गए तो किसी के घर का कमाने वाला ही चला गया । प्रशासन ने कुछ थोड़ा बहुत मुआवजा दे दिया हो गई इतिश्री। प्रशासन की लापरवाही से किसी भी घर का एक व्यक्ति अगर काल के गाल में समा जाए तो पूरा परिवार बिखर जाता है। अगर परिवार मध्यम या निम्न आयवर्ग का हो तो कईबार भूखे मरने की नौबत तक आ जाती है । बरगी में जो हादसा हुआ उसका जिम्मेदार कौन था पर्यटक,प्रशासन या क्रूज सर्विस वाला । लाइफ जैकेट तो लाइफलेस थी ।उसे पहनने वाले तो फुल ऑफ लाइफ होते हैं । लाइफ जैकेट तो तब लाइफ बचा पाती जब वो मानकों पर खरी उतरती और क्रूज वाले सवारियों को इन लाइफ जैकेटों को पहनने का तरीका बताते और इन लाइफ जैकेटों को उचित तरीके से पहना कर बैठाते । लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि क्रूज पर बैठने वाले सभी आम लोग थे । यदि कोई वीआईपी इस क्रूज में होता तो सारा प्रशासन उसकी सुरक्षा को चक चौबन्द करता और अव्वल दर्जे की लाइफ जैकेट पहनाई जाती और साथ ही गोताखोरों की टीम तैयार खड़ी रहती । पहले तो कोई हादसा होता ही नहीं अगर खुदा न खास्ता कुछ होता तो स्तिथि पर नियंत्रण पा लिया जाता । बेचारा आम आदमी अपने परिवार के साथ कुछ यादगार पल बिताना चाहता था मगर वो अब केवल याद बनकर रह गए ।
जैकेट तो जैकेट ही है इसमें लाइफ कहाँ। इस जैकेट को पहनने वाली एक मां न तो खुद को बचा पाई न ही अपने मासूम बच्चे को । ये लाइफ जैकेट मां और बेटे की लाइफ को समाप्त कर गई । इस पर एक और कांड किया इस क्रूज कंपनी ने जांच एजेंसियों की जांच से पहले ही क्रूज को तोड़ दिया । अब जांच एजेंसियां किस की और क्या जांच करेगी ? आरोप प्रत्यारोप में सब थोड़ी सी सजा और जुर्माना भर कर छूट जाएंगे फसेगी बेचारी लाइफ जैकेट जो लाइफ को बचा न पाई ।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)






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