तो छोटा सा असंतुलन भी नवजात के विकास और ग्रोथ डाल सकता है प्रभाव - डा अमित
मेरठ। नवजात शिशुओं में हाईपोथराईडिज्म एक ऐसी चुपचाप चलने वाली बीमारी है जिसमें थायरॉयड ग्रंथि कम या बिलकुल काम नहीं करती है। इसके लक्षण शुरूआत में कम प्रकट होते है लेकिन अगर समय पर नहीं पहचाना तो मस्तिक व शारीरिक विकास स्थायी नुकसान हो सकता है। उक्त जानकारी बाल रोग विशेषज्ञ डा अमित उपाध्यय ने दी।
उन्होंने बताया कि अधिकांश देशाें में नवजात हाइपोथायराईडिज्म की स्क्रीनिंग अब रूटीन नवजात जांच का हिस्सा है। जन्म के बाद 2 से 5 दिन में रक्त की छोटी जांच टीएचएस प्लस माइनस टी 4 से अधिकां मामले पहले ही पकडे जा सकते है। समय पर दवा थायराॅयड हार्मोन प्रतिस्थापन शुरू करने पर शिशु सामान्य विकास कर सकता है। थायराइड की पूर्व बीमारी वाली मातांए ,परिवार में हाईपोथायरॉइडिज्म का इतिहास या जन्म के समय अत्याधिक बड़ा जिह्वा धीमी नाड़ी लगातार नीदं ओर खाने में कमी जैसे लक्षण है।
उन्होंने बताया कि हाइपोयरॉडिज्म का उपचार आमतौर पर दैनिक थायराॅइड हार्मोन -लीवाे थायरॉक्सिन की गोली होती है। जिसकी खुराक नियमित रक्त परीक्षणों के आधार पर समायोजित की जाती है । अगर उपचार समय पर शुरू कर दिया जाए तो शिशु सामान्य बुद्धि ,ऊंचाई और स्वास्थ्य विकसित कर सकता है।देरी से विकासात्मक देरी ,सीखने की कठिनाई और मानसिक विकास पर दीर्घकालिन नुकसान हो सकते है।
उन्होने बताया नवजात शिशुओं की थायरॉइड स्क्रीनिंग को अनिवार्य माना जाए। वैसे ताे जिला अस्पताल व मेडिकल कालेज व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र व कुछ प्राइवेट अस्पतालों में नवजातों की स्क्रीनिंग की जा रही है। लेकिन सभी अस्पतालों को नवजात की स्क्रीनिंग करायी जानी चाहिए। इस मोके पर डा संदीप गर्ग मौजूद रहे।


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