राष्ट्रवाद का नया सैनिटाइजर

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
विशाल बाबू की राशन की दुकान पर मिलावट का धंधा जोरों पर था। जब मोहल्ले के लोगों ने विरोध किया, तो विशाल बाबू ने दुकान का नाम बदलकर 'अखंड भारत किराना स्टोर' रख दिया और बाहर दो बड़े लाउडस्पीकर लगवा दिए, जिन पर दिन-रात देशभक्ति के गीत बजते थे। जैसे ही कोई ग्राहक दाल में कंकड़ की शिकायत करता, विशाल बाबू जोर से चिल्लाते, "क्या? इस पावन धरती की मिट्टी को आप कंकड़ कह रहे हैं? क्या आपको इस मिट्टी की खुशबू नहीं आती? आप पक्का उस पड़ोसी देश के एजेंट हैं!"
ग्राहक बेचारा 'देशद्रोही' कहलाने के डर से चुपचाप कंकड़ वाली दाल लेकर घर चला जाता। विशाल बाबू ने अब 'राष्ट्रवाद का सैनिटाइजर' ईजाद किया था। वे हर गलत काम के बाद तिरंगा गमछा ओढ़ लेते और सोशल मीडिया पर किसी को 'प्रमाण पत्र' बांटने लगते। उन्होंने अपनी काली कमाई को 'राष्ट्रीय चंदा' घोषित कर दिया।
एक दिन सरकारी इंस्पेक्टर जांच के लिए आया, तो विशाल बाबू ने उसे 'राष्ट्रविरोधी' होने का डर दिखाया और पूछा, "क्या आप इस ऐतिहासिक दुकान की पवित्रता पर शक कर रहे हैं?" इंस्पेक्टर ने डर के मारे बिना जांच किए ही 'क्लीन चिट' दे दी। मोहल्ले का एक रिटायर्ड फौजी जब सच बोलने आगे आया, तो उसे 'बूढ़ा और भ्रमित' घोषित कर दिया गया।
विशाल बाबू अब शहर के सबसे बड़े 'नैतिक संरक्षक' बन चुके थे। उनकी दुकान की गंदगी अब 'सांस्कृतिक धरोहर' मानी जाने लगी थी। अंत में, विशाल बाबू ने अपनी मिलावटी हल्दी को 'क्रांतिकारी चूर्ण' बताकर दोगुने दाम पर बेचना शुरू कर दिया और पूरा शहर गर्व से उसे खाकर बीमार होने लगा।

1 comment:

  1. वाह चालू नैतिक संरक्षक जी!

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