स्वास्थ्य सेवाएँ : कितनी स्वस्थ्य
 ललिता जोशी 
किसी भी देश की प्रगति उसके नागरिकों और नौनिहालों के स्वास्थ्य पर निर्भर करती है।नागरिक स्वस्थ होंगे तो वो राष्ट्र निर्माण में अपना सक्रिय योगदान देंगे । ये विश्व के सभी देशों की प्राथमिकता भी है। प्रत्येक वर्ष 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। ये दिवस वैश्विक  स्वास्थ्य से संबन्धित आवश्यक समस्याओं को चिन्हित कर सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाने के लिए संगठित कार्रवाई करता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 1950 में शुरू किया गया यह दिवस प्रत्येक वर्ष महत्वपूर्ण स्वास्थ्य प्राथमिकताओं पर ध्यान दिलाने के लिए सरकारों और संस्थानों को एकजुट करता है। प्रत्येक वर्ष कोई न कोई थीम रखा जाता है ।  वर्ष 2025 का थीम  था ,”स्वस्थ शुरुआत, आशापूर्ण भविष्य “। इस थीम के तहत मातृ और नवजात शिशु के स्वास्थ्य पर केन्द्रित रहा। सरकार स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अपनी प्रतिबद्धता को बनाए हुए है ।
पिछले कई वर्षों से आयुष्मान भारत और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसी पहलों  से देश ने स्वास्थ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है । इसकी बदौलत मातृ और बाल स्वास्थ्य में सुधार आया । डिजिटल स्वास्थ्य पहुँच का विस्तार हुआ और बुनियादी ढांचा और सेवाएँ में संवर्धन हुआ है । ये दावे हैं । ऐसा होना भी चाहिए क्योंकिअपना देश लोकतान्त्रिक देश है । सरकारें दावा करती हैं कि देश सभी को स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं । यह सरकार का दायित्व भी है । राज्य अपने स्तर स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करते हैं और केंद्र सरकार अपने स्तर पर ।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें कमजोर आय वर्ग के लिए अपने-अपने स्तर पर हेल्थ कार्ड और स्वास्थ्य योजनाएँ बनाती हैं । इससे बहुत से लोग लाभान्वित भी हो रहे हैं । इतना सब कुछ होने पर भी वास्तविकता सभी को मालूम है । खांसी की दवा से होने वाली मौतें हों या फिर दूषित जल के सेवन से आया जलजला न जाने कितनों को अपना शिकार बना गया । इलाज के लिए महीनों से अपनी बारी का इंतज़ार करते मरीज और न जाने क्या-क्या । सरकार सरकारी नौकरी पेशे वाले लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करती है । सरकार अपने सेवारत और सेवानिवृत्त कार्मिकों को स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करती है । पहले तो ये सब सरकारी अस्पतालों और डिस्पेंसरियों में ही होता था । अब सरकार ने इसमें प्राइवेट अस्पतालों को भी अपने पैनल में रख लिया है । इन अस्पतालों का गौरखधंधा क्या है इस से सभी परिचित हैं । यहाँ तो पे पेकेज की तरह इलाज का पेकेज होता है ।

सरकारें सीनियर सिटीजन्स की गरिमा बनाएँ रखने के लिए प्रतिबद्ध होती हैं और बुजुर्गों के लिए योजनाएँ बनाती हैं और उन्हें कार्यान्वित भी करती हैं । समाज में वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या से हमारे समाज का काला सच दिखाई पड़ता है कि कितने उपेक्षित हैं बुजुर्ग । ठीक ऐसा ही सरकारी सेवानिवृत्त कार्मिक भी महसूस करते  हैं । इसमें भी  दशकों से अधिक की सेवा कर सेवानिवृत्त हुए वरिष्ठ नागरिकों को बोझ की तरह देखा जाता है । ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा सरकार को सेवाएँ प्रदान करने में लगा दिया । इस सेवा के एवज में उन्हें वेतन दिया गया और इन सरकारी नौकरों ने भी सरकार को आयकर भी दिया और नौकरी में रहते हुए स्वास्थ्य योजना के लिए भी प्रति माह सरकार को पैसा भी दिया।सेवानिवृत्ति के पश्चात इन स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने के लिए एक मुश्त राशि सरकार को देनी होती है ।
बेचारा सेवानिवृत्त सरकारी नौकर निश्चिंत हो जाता है कि सरकार से उसे स्वास्थ्य सेवाएँ मिलती रहेंगी । वैसे किसी को अस्पताल जाने का कोई शौक नहीं होता । अपने यहाँ अक्सर कहा जाता है कि भगवान दुश्मन को अस्पताल और कचहरी का मुंह न दिखाये । मगर करें क्या ? वैसे तो इतने सारे प्राइवेट अस्पताल को सीजीएचएस (केंद्र सरकार स्वास्थ्य सेवाओं ) के अंतर्गत पैनल पर हैं । हाल फिलहाल मुझे अपनी किसी बीमारी के सिलसिले में सीजीएचएस पैनल वाले अस्पताल में जाने का मौका मिला । जब अस्पताल पहुंचे तो लगा कि किसी खैराती अस्पताल में तो नहीं आ गए ? भीड़ इतनी कि पूछो मत । ऐसा लगा कि सारा शहर बीमार पड़ा हुआ है ।

वैसे अपने देश में जहां भी चले जाइए भीड़ ही भीड़ दिखाई दे जाएगी । भीड़ भारतीयता का प्रतीक बन चुकी है । आइये फिर चलते हैं अस्पताल की ओर लाइन में खड़े हुए तो हमने डेस्क पर बैठे क्लर्क को गर्व से बताया हम तो पेंशनर हैं । उसने प्रक्रिया पूरी करी तो हमने एक डॉक्टर का नाम लिया की हमें फलाने डॉक्टर को दिखाना है तो क्लर्क महोदय ने कहा कि ये डॉक्टर सीजीएचएस के पैनल पर नहीं हैं । जब हमने  कहा की  हम भुगतान करने को तैयार हैं तो फिर क्लर्क महोदय ने बताया की इनके लिए आपको पूर्व अपोइन्टमेंट लेना होगा । जिस डॉक्टर की अपोइन्टमेंट मांगो वही पैनल पर नहीं है का टका सा जवाब दे दिया । जब हॉस्पिटल पैनल पर है तो भैया जी सारे डॉक्टर पैनल पर होने चाहिए । भगवान न करे कोई अगर दूसरे शहर से आ रहा हो तो वो क्या करेगा । इस सबमें हमारा तो सिर चकराने लग गया । हम तो वहाँ से निकलकर ऐसे भागे जैसे कोई भूत देख लिया हो । पता नहीं ये कैसी स्वास्थ्य सेवाएँ हैं ? जिसे देखकर बीमार आदमी का मनोबल टूटता है ।




इतना ही नहीं इलाज के दौरान बहुत सी आइटम ऐसी होती हैं जिनका भुगतान मरीज को करना ही पड़ता है । अगर किसी के पास पैसा न हो तो वो क्या करेगा । यहाँ एक और प्रश्न मस्तिष्क में उठ रहा है की हमारे राजनीतिज्ञों को भी ऐसे ही स्वास्थ्य सेवाएँ मिलती हैं जैसे की एक आम नागरिक को । सरकारी अस्पतालों की हकीकत किसी से छिपी नहीं है।सरकारें मुफ्त की योजनाओं पर तो अपना पूरा ज़ोर लगा देती हैं लेकिन जो सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी अपनी जमापूंजी में से एकमुश्त राशि इसलिए देते हैं कि उन्हें स्वास्थ्य खराब होने पर निशुल्क इलाज मिलेगा लेकिन असलियत तो ये है कि  उन्हें भुगतान  करना पड़ता है । आजकल सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं में इन्शुरेंस सैक्टर को  भी ला  खड़ा किया है । इसी कारण  सरकारी कार्मिकों में कुछ खलबली मची हुई है । कुछ भय भी बना हुआ है । समय के साथ इन्शुयरेंस सैक्टर की मंशा कार्मिकों को समझ आ जाएगी या समझा दिया जाएगा । शायद  सरकार स्वास्थ्य के मामले में मरीजों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है।  
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)

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