डिजिटल दुनिया का अंधेरा
राजीव त्यागी
हाल ही में गाजियाबाद में नाबालिग किशोरियां कोरियन गेम की लत का शिकार हो गई, यह बहुत ही दुखद घटना है। खेल के साथ जिंदगियां भी खत्म हो गईं। वास्तव में यह घटना एक ऑनलाइन गेम की लत और उस पर अत्यधिक निर्भरता से जुड़ी है।
पुलिस ने यह पाया कि बच्चों को गेम खेलने से रोकने पर वे भावनात्मक रूप से टूट गए थे। बहरहाल, यह पहली बार नहीं है जब ऐसी घटना घटित हुई है। पहले भी ऑनलाइन गेम्स के कारण बच्चों/लोगों की जानें जा चुकी है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में ऑनलाइन वीडियो गेम्स और मोबाइल गेम्स से जुड़ी लत, तनाव और वित्तीय/मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण कई घटक परिणाम सामने आए हैं, जिनमें कुछ मौतें, आत्महत्याएं और जानलेवा घटनाएँ शामिल हैं।
बहरहाल, यदि हम यहां पर सरल शब्दों में बात करें तो हाल की घटनाएं यह दिखाती हैं कि आज के बच्चे और युवा डिजिटल दुनिया में कितनी गहराई तक फंसते जा रहे हैं। वे एक साथ दो दुनिया में जी रहे हैं-एक असली (वास्तविक) और दूसरी मोबाइल-स्क्रीन वाली आभासी दुनिया या यूं कहें कि वर्चुअल दुनिया। गेम और सोशल मीडिया बुरे नहीं हैं, लेकिन जब यही किसी की पहचान, खुशी और सहारे का एकमात्र जरिया बन जाएं, तो समस्या खड़ी हो जाती है।
आज कई परिवार या तो बच्चों की डिजिटल आदतों पर ध्यान नहीं देते, या फिर अचानक सख्ती दिखाने लगते हैं-लेकिन दोनों ही तरीके नुकसानदेह हैं। वास्तव में, यह समस्या सिर्फ एक परिवार या एक शहर तक सीमित नहीं है। झाबुआ और भोपाल की घटनाएं भी बताती हैं कि सोशल मीडिया और रील्स की लत रिश्तों और संवेदनाओं पर भारी पड़ रही है।
जब रोक-टोक होती है, तो टकराव पैदा होता है, और वही टकराव कभी आत्महत्या तो कभी हिंसा का रूप ले लेता है।असल सवाल यही है कि क्या हम ऐसा समाज बना रहे हैं, जहां मोबाइल की दुनिया इंसानी रिश्तों से ज्यादा ताकतवर हो गई है। इस संकट से बचने का रास्ता सख्ती नहीं, बल्कि समझ, संवाद और संतुलन है-ताकि बच्चे स्क्रीन के नहीं, जीवन के साथ जुड़े रहें।





No comments:
Post a Comment