अंगदान का संकल्प तो बढ़ा, लेकिन प्रत्यारोपण का ढांचा अब भी कमजोर

मध्य प्रदेश में जरूरत अंगदान के प्रचार से आगे बढ़कर जिला स्तर तक मजबूत ट्रांसप्लांट नेटवर्क और जवाबदेह व्यवस्था बनाने की

डॉ. अतुल मलिकराम, राजनीतिक रणनीतिकार

किसी परिवार के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि उसका अपना कोई सदस्य दुनिया से चला जाए। लेकिन उसी दुख के बीच यदि उसके अंग कई दूसरी जिंदगियों को बचा सकते हों, तो यह मृत्यु के बाद जीवन देने का अवसर भी बन सकता है। सवाल यह है कि क्या हमारे पास उन अंगों को समय पर जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाने की पर्याप्त व्यवस्था है?

मध्य प्रदेश में यह सवाल अब केवल स्वास्थ्य व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है। यह नीति, प्रशासनिक क्षमता और जवाबदेही से भी जुड़ चुका है।

देश में अंगदान को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ रही है। जून 2026 में केंद्र सरकार ने बताया था कि देश में पांच लाख से अधिक लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया है। अगस्त 2025 में सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और उनकी पत्नी ने भी अंगदान का संकल्प लेकर इस अभियान को सार्वजनिक समर्थन दिया। इसका अर्थ है कि समाज के प्रभावशाली वर्गों से लेकर आम नागरिकों तक यह संदेश पहुंच रहा है कि मृत्यु के बाद भी किसी की जिंदगी बचाई जा सकती है।

लेकिन केवल संकल्प पर्याप्त नहीं है। उस संकल्प को वास्तविक अंगदान में बदलने के लिए अस्पताल, प्रशिक्षित चिकित्सक, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर, आईसीयू, अंग रिट्रीवल की सुविधा, ग्रीन कॉरिडोर और त्वरित प्रशासनिक निर्णयों की पूरी श्रृंखला चाहिए। मध्य प्रदेश में इस दिशा में कुछ सकारात्मक बदलाव जरूर हुए हैं, लेकिन जरूरत की तुलना में यह प्रयास अभी सीमित दिखाई देता है।

कुछ सफल उदाहरण उम्मीद जगाते हैं

मध्य प्रदेश में बदलाव की क्षमता मौजूद है। जनवरी 2025 में एम्स भोपाल में राज्य का पहला हृदय प्रत्यारोपण हुआ। जबलपुर में ब्रेन-डेड मरीज से प्राप्त अंगों को ग्रीन कॉरिडोर और सरकारी एयर एंबुलेंस के जरिए दूसरे शहरों तक पहुंचाया गया। अगस्त 2025 में जबलपुर के नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में पहली बार कैडेवरिक किडनी ट्रांसप्लांट भी सफल रहा।

सितंबर 2026 में एम्स भोपाल से मिले एक कैडेवरिक डोनर के हृदय, लीवर और दोनों किडनी से चार मरीजों को लाभ मिला। ये घटनाएं बताती हैं कि इच्छाशक्ति, विशेषज्ञता और प्रशासनिक समन्वय हो तो मध्य प्रदेश में भी अंगदान को जीवन बचाने के अभियान में बदला जा सकता है।

लेकिन इन सफलताओं के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—क्या ऐसी सुविधाएं पूरे प्रदेश में उपलब्ध हैं?

नवंबर 2025 की रिपोर्टों में विशेषज्ञों ने बताया था कि अंग रिट्रीवल और ट्रांसप्लांट की सुविधाएं मुख्य रूप से भोपाल, इंदौर और जबलपुर तक सीमित हैं। अधिकांश जिलों में प्रशिक्षित टीमें और आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं है। इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों के उन मरीजों पर पड़ता है, जिन्हें इलाज के लिए बड़े शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

पोर्टल से आगे जमीन पर व्यवस्था की जरूरत

मध्य प्रदेश में स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन यानी SOTTO की व्यवस्था मौजूद है। अस्पतालों और डोनर-रिसिपिएंट डेटा को जोड़ने की दिशा में भी काम हुआ है। लेकिन अब जरूरत इस व्यवस्था को कागज और पोर्टल से आगे जमीन पर मजबूत करने की है।

तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों के अनुभव से मध्य प्रदेश सीख सकता है। तेलंगाना का जीवनदान मॉडल अंगदान, अस्पतालों के बीच समन्वय, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटरों की ट्रेनिंग और पारदर्शी अंग आवंटन पर केंद्रित है। ऐसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल अंगदान की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि दान किए गए अंग को समय पर सही मरीज तक पहुंचाना भी है।

हर संभाग में बने ट्रांसप्लांट हब

मध्य प्रदेश के लिए अब एक दीर्घकालिक ‘मध्य प्रदेश ऑर्गन ट्रांसप्लांट मिशन’ की जरूरत है। अगले पांच वर्षों के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय किए जा सकते हैं।

हर संभाग में कम से कम एक मजबूत सरकारी ट्रांसप्लांट हब विकसित किया जाए। जिला अस्पतालों में ब्रेन-डेथ की पहचान और अंग रिट्रीवल की क्षमता बढ़ाई जाए। बड़े अस्पतालों में प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर नियुक्त किए जाएं।

इसके साथ पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, चिकित्सा शिक्षा विभाग, एयर एंबुलेंस और जिला प्रशासन के बीच एक स्पष्ट स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू होना चाहिए, ताकि किसी संभावित अंगदाता की पहचान से लेकर अंगों को जरूरतमंद मरीज तक पहुंचाने में अनावश्यक देरी न हो।

निजी अस्पतालों को भी इस मिशन का साझेदार बनाया जाना चाहिए। इंदौर में पहले से कई अस्पतालों में ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटरों का नेटवर्क और ट्रांसप्लांट गतिविधियां मौजूद हैं। इसी मौजूदा क्षमता को राज्यव्यापी नेटवर्क में बदला जा सकता है।

आंकड़ों के साथ तय हो जवाबदेही

राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से किसी भी नीति की सफलता तीन चीजों से तय होती है—स्पष्ट लक्ष्य, जिम्मेदार अधिकारी और मापने योग्य परिणाम।

इसलिए सरकार को हर वर्ष सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि कितने अस्पताल ट्रांसप्लांट और अंग रिट्रीवल के लिए अधिकृत हुए, कितने ब्रेन-डेथ मामलों की पहचान हुई, कितने अंगदान हुए, कितने प्रत्यारोपण किए गए और कितने मरीज प्रतीक्षा सूची में हैं।

अंगदान केवल संवेदना का विषय नहीं है। यह शासन की उस क्षमता की भी परीक्षा है जिसमें एक बेहद कठिन परिस्थिति को किसी दूसरे व्यक्ति के लिए जीवन बचाने के अवसर में बदला जा सकता है।

मध्य प्रदेश में अब सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि लोगों को अंगदान के लिए कैसे प्रेरित किया जाए। असली सवाल यह है कि जो लोग अंगदान का संकल्प ले रहे हैं, उनके संकल्प को वास्तविक जीवनदान में बदलने के लिए हमारी व्यवस्था कितनी तैयार है।

यही वह बिंदु है जहां से प्रशासनिक जवाबदेही शुरू होती है।

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