बदायूं दोहरे हत्याकांड में चार दोषियों को राहत, हाईकोर्ट ने फांसी की सजा रद्द कर किया बरी

अभियोजन पक्ष हत्या का आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका; मुख्य गवाह अदालत में मुकर गई, जांच में भी कई खामियां मिलीं

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बदायूं के चर्चित दोहरे हत्याकांड में चार अभियुक्तों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने सेशन कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा रद्द करते हुए विजयपाल, किशनलाल, रामवीर और जलधारा को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

2017 में हुई थी गोविंद और आशा की हत्या

मामला बदायूं के वजीरगंज थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के मुताबिक 14 मई 2017 की सुबह गोविंद और आशा की धारदार एवं भारी हथियारों से हत्या कर दी गई थी। गोविंद के पिता पप्पू ने एफआईआर दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि गोविंद और आशा के बीच प्रेम संबंधों से नाराज होकर आशा के परिजनों ने दोनों की हत्या की।

2022 में मिली थी फांसी की सजा

मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने सितंबर 2022 में चारों आरोपियों को IPC की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाया था। इस फैसले के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।

मुख्य गवाह ने अदालत में बदला बयान

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा के दौरान अभियोजन की मुख्य चश्मदीद गवाह रेशमा के बयान को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत में रेशमा अपने पूर्व बयान से मुकर गई और उसने कहा कि उसने घटना देखी ही नहीं थी। घटना के करीब दो महीने बाद उसका बयान दर्ज किए जाने का भी पुलिस की ओर से ठोस कारण नहीं बताया जा सका।

जांच में भी मिलीं कई खामियां

कोर्ट के सामने यह भी आया कि घटना घनी आबादी वाले इलाके में सुबह हुई थी, लेकिन जांच अधिकारी ने आसपास रहने वाले किसी पड़ोसी का बयान दर्ज नहीं किया। कथित हत्या में इस्तेमाल हथियारों की बरामदगी के मेमो के स्वतंत्र गवाहों को भी अदालत में पेश नहीं किया गया। इसके अलावा वादी और जांच अधिकारी के बयानों में हथियारों की बरामदगी को लेकर विरोधाभास पाए गए।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अभियोजन की कहानी को संदेह से परे साबित नहीं माना और चारों अभियुक्तों को बरी करते हुए ट्रायल कोर्ट की मृत्युदंड की सजा निरस्त कर दी।

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