थाली से तलवे तक : चाटने की सतरंगी दुनिया


- ललिता जोशी
चाटने का अटूट संबंध खाने -पीने के साथ है । जैसे ही ये शब्द जहन में आता है तो मुंह में पानी भर जाता है क्योंकि स्वादिष्ट व्यंजनों के स्मरण मात्र से नथुनों में इसकी ख़ुशबू भर जाती है और स्वाद ग्रंथियां भी फड़फड़ाने लगती है ताकि आत्मा की तृप्ति हो जाए चाहे वो वास्तविक न होकर आभासी ही हो। जब थाली में स्वादिष्ट भोजन परोसा जाता है तो खाने वाले भी उँगलियाँ चाट -चाट कर खाना खाते हैं यहाँ तक की थाली और कटोरी भी चाट -चाट कर ऐसी कर देते हैं कि एक बार को बर्तन धोने वाले को धोखा हो जाता है कि बर्तन झूठा है या साफ । चाट को चाटने का जो आनंद है उसके कहने ही क्या ?जैसे गूंगे का गुड है । उसकी अनुभूति की जा सकती है लेकिन उसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता है । कबीर ने कहा है कि ‘ सो गूंगा गुड़ खाइके, कहै कौन मुख स्वाद ‘।
भोजन को चाटने से आत्मा तृप्त होती है । चाटने कि महिमा सर्वव्यापी है । इसका संबंध भोजन के साथ ही नहीं है। आजकल इसका कार्य, प्रयोग और व्याख्या बहुत ही विशद है। चाटना शब्द खाने के साथ ही संयुक्त और प्रयुक्त हो, ऐसा नहीं है । थूक कर भी चाटा जाता है। ये बहुत ही पुरानी क्रिया है । वर्तमान में हमारे देश के कर्णधार पॉलिसी मेकर, लोकतन्त्र के चयनित ठेकेदार बड़े-बड़े भाषण देते हैं क्योंकि भाषण पर कोई राशन नहीं होता। इसीलिए अपने राजनीतिक दल की विचारधारा और उद्देश्य को उत्कृष्ट कोटि का बताते हैं । सब जबानी जमा खर्च । ठहरो तो सही मगर ....मगर, अगर पार्टी इनको चुनाव का टिकट न दे और दूसरी पार्टी टिकट देने को आतुर हो जाए तो फिर कहने ही क्या तथाकथित राजनीति के कर्णधारों के ।
अपनी मूल पार्टी को छोड़ टिकट देने वाली पार्टी में स्कूबा डाइवर की तरह कूद जाते हैं और चुनाव का टिकिट लेकर परम की आनंद अनुभूति के साथ बाहर आते हैं। टिकट देने वाली पार्टी के लिए ताली और अपनी मूल पार्टी को गाली देते हुए दिख जाएगें वो भी डंके की चोट पर। वैसे इस प्रजाति के लोग आपको प्रत्येक स्तर और वर्ग में देखने को मिल जाएंगे । ये घर परिवार से लेकर समाज, देश और विदेश में देखने को मिल जाते हैं । इस प्रजाति के लोग बहुत ही प्रेक्टिकल होते हैं क्योंकि ये थूक कर चाटने की कला में निष्णात होते हैं । ये सिर्फ और सिर्फ अपने लाभ के लिए सजग रहते हैं तभी तो इनको प्रगति की सीढ़ी का मार्ग और पता मालूम होता है । इसमें कोई लिंग -भेद नहीं होता न कोई न ही जात – पात कोई बंधन होता । सफलता के शिखर पर ये पहुँच भी जाते हैं मगर कभी-कभी चारों खाने चित्त भी हो जाते हैं।


चाटना भी एक कला है । चाटने का एक बहुत ही लोकप्रिय प्रकार है -तलवे चाटना। ये दिखता तो नहीं है लेकिन महसूस तो हो जाता उस व्यक्ति को जिसके तलवे चाटे जाते हैं । ये कार्य बड़ा ही शिद्दत के साथ मुद्दतों तक किया जाता है तब कहीं जाकर उसका परिणाम देखने को मिलता है । तलवे चाटने वाला व्यक्ति यह श्रम वहीं करता है जहां से उसे निश्चित लाभ प्राप्त होना है मतलब निवेश में शर्तिया लाभ की गारंटी हो । तलवे चाटने वाला व्यक्ति वन टू वन फ्रेम में यह कार्य करता है । साधक और साध्य वाला संबंध होता तलवे चाटने वाले का जिसके वो तलवे चाटता है । तलवे चाटने वाला व्यक्ति अपने हित को साधने के लिए नतमस्तक होकर गुलामों की तरह दासता करता है और अपना काम निकाल कर ही दम लेता है । इस तरह के चाटने में अलग ही स्वाद आता है । स्वाद ! काम निकालने का और उससे मिली सफलता का लेकिन आत्मसम्मान को ताक पर रखना पड़ता है । तलवे चाटना और जूते चाटना एक ही है।

लोग दिमाग चाटने में भी कुशल होते हैं । दिमाग कई प्रकार से चाटा जाता है । पहले तो सिर्फ बातों से ही दिमाग चाटा जाता था । दिमाग चाटने वाला बेकार बे सिर पैर के सवाल बार -बार पूछ कर सामने वाले को हैरान-परेशान करता है। अब तो ये बातें मोबाइल पर वाट्सऐप्प के माध्यम से भी की जाती है । अगर किसी व्यक्ति में रुचि न हो तो वो अगर नीरस बात करे तो बात सुनने वाला थक कर बोर हो जाता है और सुनने वाले के दिमाग में बार-बार विचार आता है कि अब तो दिमाग चाट डाला और जब सब्र का पैमाना छलक जाता है तो सुनने वाला बोल ही पड़ता अब बस भी करो भाई दिमाग न चाटो।

शब्द चाटना मेहनत और ज्ञान का प्रतीक है । विलक्षण लोग किताबों के शब्द चाट लेते हैं और अपने ज्ञान को नई उचाइयों पर ले जाते हैं। यानि इतनी मेहनत करते हैं कि ज्ञानार्जन कर लेते हैं । इसका एक और अर्थ है कि बिना सोचे – समझे रटना। ओस चाटना यानि कम में काम चलाना। कभी-कभी किसी की खुराक इतनी कम होती है कि लोग कह उठते हैं कि ये ओस सी चाटता है। या फिर इतनी कम मदद करना कि वो न के बराबर हो । कभी -कभी प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त राज्यों को मिलने वाली मदद ऐसे होती है जैसे कि ओस की बूंदें चाटना हो ।



सड़कों की धूल चाटना । बताओ जी धूल भी कोई चाटने की चीज है क्या ? मगर भाई धूल भी चाटी जाती है । आजकल हमारे युवा बेरोजगारी के कारण इधर -उधर भटक रहें हैं तो उन्हें भी घर वालों से ताने सुनने पड़ते हैं की खाली-पीली में यहाँ -वहाँ सड़कों पर धूल मत चाटो । बेचारा देश का भविष्य सड़कों पर धूल चाट रहा है । ठीक ऐसे ही जब कोई बड़ा आदमी खाली बैठा हो यही कहा जाता है वो तो आजकल सड़कों की धूल चाट रहे हैं ।
थूक कर चाटने वाले भी को कभी सड़कों की धूल चाटनी पड़ती है । चाटना तो चाटना है चाहे भोजन को चाटो या फिर थूक चाटो या फिर तलवे । चाटना एक अर्थ और प्रकार अनेक। चाटने की चाहत तो स्वाद के लिए होती या फिर कम समय में ज्यादा सफलता की दरकार हो ।
(मुनिरका एंक्लेव)

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